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पाकिस्तान का नहीं हिन्दोस्तान का शायर हूं...वो शायर जिसने खुद को तबाह कर लिया

मैं पाकिस्तान का नहीं हिन्दोस्तान का शायर हूं और रहूंगा...वो शायर जिसने खुद को तबाह किया लेकिन मलाल नहीं रहा

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Jaun Elia Birth Anniversary: मशहूर शायर जॉन एलिया की आज 93वीं जयंती है. उनका जन्म 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ था. बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गए थे लेकिन उन्हें आज भी सरहद के दोनों तरफ से भरपूर प्यार मिलता है.

पाकिस्तान का नहीं हिन्दोस्तान का शायर हूं...वो शायर जिसने खुद को तबाह कर लियाZoom
मशहूर शायर जॉन एलिया
नई दिल्ली. शाम होने को थी लेकिन अंधेरा नहीं हुआ था, शायद 5 बजे होंगे, कुछ बच्चे घर के बाहर मोहल्ले में खेल रहे थे. खेल-खेल में बच्चों ने मगरिब की तरफ रेस लगाने की सोची, दौड़ लगाते हुए उन्हीं में से एक बच्चे के मुंह से अचानक निकला-

“करबला जाने से रात हो जाएगी!”
इतना कहने के बाद वो फौरन खड़ा हो गया, उसे ये बात समझ नहीं आ रही थी, बिना कुछ सोचे-समझे अचानक उसकी ज़ुबां पर ये बात क्यों और कैसे आई? लेकिन इतना जरूर समझ में आया कि ये कोई आम इबारत, आम बात नहीं है जो अक्सर कही जाती है, ये वो नस्र नहीं है. कुछ समय बाद यही बच्चा सिर्फ 8 साल की उम्र में अपना पहला मुकम्मल शेर कहता है.
चाह में उसकी तमाचे खाए हैं
देख लो सुर्खी मेरे रुख़सार की!! 
ये बात है 1930 के दशक की और इस बच्चे का नाम था सय्यद हुसैन जौन असग़र, जो आगे चलकर उर्दू शायरी का रॉक स्टार कहा गया और जिसे हम जौन एलिया के नाम से जानते हैं. वही जौन जिन्हें मजरूह सुल्तानपुरी ‘शायरों का शायर’ कहते हैं. वही जौन जिनके लिए उनके दोस्त क़मर रज़ी ने कभी कहा था- जल्द बुरा मान जाने वाला लेकिन बेहद सच्चा दोस्त, अपने ही ख्यालों में डूबा रहने वाला राहगीर, एक अभिमानी दार्शनिक, फौरन रो देने वाला हमदर्द, हद दर्जे तक स्वाभिमानी और मनमौजी आशिक, सारे ज़माने को अपना दोस्त बना लेने वाला अजनबी, बेहद अव्वल दर्जे का गैर-जिम्मेदार, ये वो फ़नकार है जिसे दुनिया जौन एलिया कहती है.
खुद एक इंटरव्यू में जौन एलिया अपने लिए कही इन बातों की तस्दीक भी करते हैं. एक शेर के जरिए जौन अपने मिज़ाज को कुछ यूं बयां करते हैं जो उन्होंने बचपन में लिखा था-
ना जाने क्या है ये बात और क्या हक़ीक़त है
मुझे तुम्हीं से मोहब्बत तुम्हीं से नफरत है!! 
8 बरस की उम्र में पहला इश्क करने वाले जौन बचपन से ही आशिक मिजाज थे. उस दौर में उनकी महबूबा ख्याली होती थीं जिनसे वो अक्सर बातें किया करते थे, ख़त लिखा करते थे. उम्र बढ़ी, जौन ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो एक लड़की से इश्क हुआ, हालांकि फ़ारिहा नाम की अपनी इस मोहब्बत से कभी इजहार-ए-इश्क नहीं कर पाए या यूं कहें कि इज़हार किया ही नहीं क्योंकि उन्हें लगता था कि इश्क का इज़हार एक छोटा काम है. हां, जौन ने इस इश्क को ज़िंदगी भर याद जरूर रखा. एक जगह जौन लिखते हैं-

फारिहा निगारिना, तुमने मुझको लिखा है
मेरे ख़त जला दीजे! 
मुझको फ़िक्र रहती है! 
आप उन्हें गंवा दीजे! 
आपका कोई साथी, देख ले तो क्या होगा!
देखिये! मैं कहती हूं! ये बहुत बुरा होगा! 
लेकिन जौन तो वो शख्सियत थे जिसने अच्छे-बुरे की परवाह कभी की ही नहीं. जौन के इश्क़ में एक अजीब अहंकार था.

हुस्न से अर्ज़-ए-शौक़ न करना हुस्न को ज़क पहुंचाना है
हमने अर्ज़-ए-शौक़ न कर के हुस्न को ज़क पहुंचाई है!! 
जौन एलिया, नौजवानों के पसंदीदा शायर हैं. चाहे वो नौजवान उनके दौर के रहे हों या फिर आज के हों. वो न सिर्फ जौन की दिल-आवेज़ शख्सियत के दीवाने हैं, बल्कि पीढ़ियां उनके मशहूर शेर, मुहावरों और कहावतों की तरह दोहराती हैं.
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मसलन-यूं जो तकता है आसमान को तू 
कोई रहता है आसमान में क्या!!
जौन की शायरी में वो जादू है या यूं कहें कि जौन उर्दू शायरी के वो जादूगर हैं कि जो एक बार उन्हें पढ़ या सुन ले वो हमेशा के लिए उनका दीवाना हो जाए. आप जौन को जितना पढ़ते हैं उनके जानिब आपकी तिश्नगी उतनी ही बढ़ती चली जाती है.

शर्म, वहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेती
आप, वो, जी, मगर ये सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेती!! 
जौन ने न जाने कितने मुशायरे लूटे और कितने ही लोगों की तन्हाइयों के साथी बन गए। 
कैसे कहें कि तुझको भी हमसे है वास्ता कोई
तूने तो हमसे आज तक कोई गिला नहीं किया!! 
निजी जिदंगी में जौन भले ही तन्हाई और उदासी पसंद रहे हों लेकिन महफिल लूटने का हुनर उन्हें बखूबी आता है. मुशायरों में उनका बेहद अलहदा व्यक्तित्व दिखता है. जौन मंच पर आते हैं और छा जाते हैं. उन्हें अपने शेर और कलाम के लिए दाद मांगनी नहीं पड़ती है बल्कि उनके हर एक लफ्ज पर तालियां बरसती हैं. आमफहम जबान में जब जौन एलिया मुशायरों में अपनी ग़जल पढ़ते हैं, तो सामयीन को लगता है कि जैसे कोई उनसे गुफ़्तुगूं कर रहा हो.

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं!! 
सामयीन को खुद से जोड़े रखने के फन में भी जौन माहिर हैं, किसी महफिल में अचानक किसी का नाम पुकार कर उसे चौंका देते हैं, किसी को नाम से बुलाकर उसका हाल पूछ लेते हैं. शेर पढ़ते-पढ़ते अचानक रोने लगते हैं, अपने बालों को नोचने लगते हैं, सिर पीटने लगते हैं, मंच पर हाथ पटकने लगते हैं, कभी अचानक मंच से उठ कर चल देते हैं. कभी खुद के शेर को ही ‘बेहूदा’ करार देते हैं.

इश्क़ को दरमियां न लाओ कि मैं
चीख़ता हूं बदन की उसरत में!! 
मशहूर शायरा ज़हरा निगाह कहती हैं “जौन अपने जाने के बाद लोगों में दिन-ब-दिन और मक़बूल होते गए. सरहद के दोनों तरफ़ जौन बराबर मशहूर हैं. शायरी ज़रिया है अनकही को कहने का और जौन को ये सलीका बखूबी आता है”. जौन के दिनों को याद करती हुई ज़हरा आगे कहती हैं कि वो अपनी ही धुन में रहा करते थे, किसी की नहीं सुनते थे. अगर उन्होंने अपने चाहने वालों की बात सुनी होती तो हो सकता है, कुछ दिन और हमारे बीच होते. भले जौन ये कहते रहे हों.

मैं भी बहुत अजीब हूं इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं!! 
लेकिन, यहीं ज़हरा कहती हैं कि जब जौन ये कह रहे हैं कि ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं तो ये तय समझिए कि उन्हें मलाल है लेकिन वो इसका इज़हार नहीं कर पाए. तभी तो उन्होंने लिखा था-

कौन इस घर की देख-भाल करे 
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है!!
अपनी ज़िंदगी की तीसरी दहाई में जौन ने भले अमरोहा छोड़ दिया और पाकिस्तान जा बसे लेकिन अमरोहा ने जौन को ताउम्र नहीं छोड़ा. उनका अमरोहा आने का सिलसिला चलता रहा. वो कभी अमरोहा को अपने से अलग कर ही नहीं पाये. अगर कोई उनका तआर्रुफ़ पाकिस्तान के शायर के तौर पर करवाता तो वो फौरन उसकी बात काटकर कहते “मैं पाकिस्तान का शायर नहीं हूं, मैं हिन्दोस्तान का शायर हूं और हिन्दोस्तान का ही रहूंगा. अमरोहा का ही रहूंगा” जौन की गज़लों और शेर में अमरोहा का ज़िक्र अक्सर मिलता है.
इस समुंदर पे तिश्ना-काम हूं मैं 
बान तुम अब भी बह रही हो क्या!!  
जौन की बहन सैय्यदा शाह-ए-ज़नॉ नजफ़ी ने लिखा है “जौन को अमरोहा के उन दिनों की बातें पसंद थीं. वो जब भी अमरोहा आते तो अपनी सरज़मीं को जरूर चूमते थे. दिल्ली में भी वो हमारे घर आते तो कहते थे कि मैं उस रूख से बैठना चाहता हूं, जिधर से अमरोहा की हवा आती है.”
कई मामलों में जौन ताउम्र बच्चे बने रहे. एक इंटरव्यू में खुद जौन ने कहा है “मेरे अंदर एक बच्चा है जो कभी बाहर आने को तैयार नहीं है, ना ही अपनी हरकतों से बाज आने को तैयार है.” शायद इसी पर उनका एक शेर है-

साल-हा-साल और इक लम्हा
कोई भी तो न इन में बल आया
ख़ुद ही इक दर पे मैं ने दस्तक दी
ख़ुद ही लड़का सा मैं निकल आया!!
यूं तो हर शायर संवेदनशील होता है लेकिन जौन एलिया कुछ ज्यादा ही संवदेनशील थे. मलिकज़ादा जावेद कहते हैं जौन को दुनिया के किसी भी कोने में कुछ गलत होता था तो बुरा लगता था और वो बेहद संवेदनशील हो जाते थे. जौन कहते थे- “दर्द तो दर्द है. इसका कोई मुल्क, मज़हब, कौम या सरहद नहीं होती. बेहद संवेदनशील होना मेरी फितरत है.” अपनी ये फितरत उन्होंने कुछ यूं बयां की है-

चारासाज़ों की चारा-साज़ी से
दर्द बदनाम तो नहीं होगा
हां दवा दो मगर ये बतला दो
मुझ को आराम तो नहीं होगा!! 
जौन अगर आज ज़िंदा होते तो 93 साल के होते. भले वो जिस्मानी तौर पर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपने अश’आर, नज़्म और गज़लों के जरिए वो उर्दू शेर-ओ-अदब की दुनिया के रॉकस्टार बने रहेंगे.

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प्रभात पाण्डेयएडिटर,News 18 उत्तर प्रदेश- उत्तराखंड
प्रभात पाण्डेय अभी News18 उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में एडिटर (न्यूज़) हैं. डीडी न्यूज़ से पत्रकारिता का करियर शुरू करने वाले प्रभात पाण्डेय पिछले करीब 17 साल से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं. यूनिवार्ता, न्यूज़ 2...और पढ़ें
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