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अगर सचमुच जानना चाहते हो...'गाडा टोला’ बुक रिव्यू, जिसके आंगन से पहाड़ दिखता है
तुम अगर सचमुच जानना चाहते हो...'गाडा टोला’, जिसके आंगन से पहाड़ दिखता है
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Agency:Local18
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झारखंड के युवा कवि राही डूमरचीर का पहला कविता संग्रह 'गाडा टोला' प्रकाशित हो चुका है. नई पीढ़ी के लेखक-कवि का गांव झारखंड में दुमका में हैं, जहां वो आदिवासियत को जीते हैं, जो उनकी कविताओं में कूट-कूट कर भरा है.

चेतन कश्यप
रांची. फर्ज कीजिए, एक बहुत बड़े से कड़ाहे में दूध औंटा जा रहा है. दूध जब गाढ़ा हो जाए, तब उसे चूल्हे से उतार दिया जाएगा. इस तरह दूध तो गाढ़ा हो ही जाएगा, उसके ठंडा हो जाने के बाद भी चूल्हे की आग उसके अंदर बनी रहेगी, ‘लेटेंट हीट’ के रूप में. राही डूमरचीर के पहले कविता संग्रह ‘गाडा टोला’ की कविताएं ऐसे ही औंटे हुए भावों वाली गाढ़ी कविताएं हैं. ये कविताएं जब पाठकों तक पहुंचती हैं, तो स्वाद के साथ-साथ कवि से कविताओं में अंतरित होती हुईं ‘लेटेंट हीट’ भी पाठकों तक पहुंचती है और धीरे-धीरे आप उस आंच को अपने भीतर महसूस करने लगते हैं. ऊपर से शीतल प्रतीत होने वाली ये कविताएं अपनी तासीर में गर्म महसूस होती हैं.
एक कवि के रूप में राही डूमरचीर ने पिछले कुछ वर्षों में हिंदी-साहित्य-समाज का ध्यान खींचा है. इस संग्रह की कविताओं से गुज़रने के बाद जो पहली बात मन में उभरती है, वह यह कि उनकी कविताओं में प्रकृति नहीं आती, बल्कि उनकी कविताएं प्रकृति के बीच से निकलती हैं. राही प्रकृति के बीच ही सहज हैं. प्रकृति उनके यहां कोई साधन नहीं बल्कि जीने का ढंग है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है –“ साहित्य में सहज होना ( मैं सरल नहीं कहता) भी मौलिकता का श्रेष्ठ प्रतिमान है.” राही प्रकृति के बीच सहज हैं और उनकी कविताएं अपनी प्रकृति में सहज हैं.
कवि जिन शब्दों के माध्यम से अपने को अभिव्यक्त करता है, जिन नामों, उपमाओं, क्रियाओं से उसकी कविता बनती है, वे उस संवेदना-लोक का पता देती हैं, जिस जमीन पर कवि खड़ा है. इस संग्रह की ‘गाडा टोला’, ‘शाल घाटी’, ‘बांधकोय’, ‘बांसलोई’, ‘हुदहुदी नदी’, ‘सरई फूल’ , ‘असुर हेम्ब्रम’, ‘अमित मरांडी’ , ‘एदेल किस्कू’, ‘हिम्बो कुजूर’ और ‘हेन्दा मय’ शीर्षक कविताएं हमें उस संसार में लिए चलती हैं, जो अभी भी बहुत-से लोगों के लिए अजाना-अनपहचाना है. ये कविताएं एक अलग भाव-संसार का सृजन करती हैं. वह संसार, जिसे कवि अपने अंदर लिए चल रहा है और जिसकी भरसक कोशिश है कि ये संवेदनाएं अपने निष्कलुष-नैसर्गिक रूप में बची भी रहें.
पाठक के लिए जो भावना-संसार कवि अपनी कविताओं में खोल रहा है, वह पाठक का निकटतम तो नहीं ही है, उसके लिए अपरिचित भी है. लेकिन पाठक जब कविताओं में उतरता है तो सारी अजनबीयत दूर हो जाती है और वह अपने सामने एक खिलता हुआ संसार पाता है. यह जो खिलता हुआ संसार है, वह राही की कविताओं की खास पहचान है.
विस्थापन और अतिक्रमण आज के दौर की क्रूर सच्चाइयां हैं. लगभग हर व्यक्ति ही इस दंश को झेलने के लिए अभिशप्त है. राही इस दु:ख से भलीभांति परिचित हैं क्योंकि वह जहां से आते हैं वहां यह सच ज्यादा क्रूर है. इस संग्रह की कविताओं में यह पीड़ा बार-बार सामने आती है और यह मार दोतरफा है. पहले तो जीवन जीने के संसाधन जुटाने के लिए लोगों को अपनी जमीन से विलग होना पड़ता है. दूसरी तरफ़, विकास के नाम पर, नए-नए अवसरों के नाम पर, आधुनिक बनाने के नाम पर दुनिया के कोने-कोने में पूंजी और सत्ता अतिक्रमण करने का कोई मौका नहीं छोड़ती. विस्थापन के दु;ख को ‘अमित मरांडी’ कविता की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है –
“जिनके घरों में बाँधकर नहीं रखे गए जानवर कभी
जिन्हें भरोसे के व्यापारियों ने
मजबूर किया जाने को ऐसी जगह
जहाँ से लौटकर वे नहीं आ पाए कभी
आजकल नहीं पता अमित कहां है
सिवाय उसकी मां की सूनी आंखों के
उसका कोई ठिकाना नहीं मिलता मुझे”
इन्हीं पंक्तियों में हम एक सहज जीवन की बेपरवाही को भी लक्षित करते हैं. यह बेपरवाही राही की अन्य कविताओं में भी उपस्थित है. जिसे पहाड़ पसंद हों, वह बंध कर, फिक्र में दुबला होकर नहीं रह सकता. जैसा कि अच्छी कविताएं करती हैं, इस संग्रह की कविताओं में भी, सिर्फ समस्याएं नहीं, हल भी हैं. ‘एदेल किस्कू’ की इन पँक्तियों को देखिए –
“ तुम अगर सचमुच जानना चाहते हो
तो ठीक से सुनो — बाहा परब में तो नहीं आ पाऊंगी
पर आऊंगी जरूर
इस बार बरसात में आऊंगी
गाडा टोला के अपने उसी घर में हमेशा के लिए
अपना खेत इस बार मैं ही जोतूंगी
और मछली भी मैं ही पालूंगी अपने पोखरा में”
अपनी सारी बात कह लेने के बाद, प्रकृति के साथ किए गए सारे अत्याचार और अन्याय के बावजूद कवि के मन में बदले की कोई भावना नहीं है. यह असल में आदिवासियत है. प्रकृति की तरफ़ से बोलता कवि आश्वासन देता है कि किसी का कोई अहित नहीं किया जाएगा. पुराना कोई हिसाब नहीं खोला जाएगा. बस कवि की और प्रकृति की इतनी-सी इच्छा है कि –
“ बस हो सके
तो अगली बार जब धूप में निकलो
अपने बच्चों को
इमारत की छांव और
पेड़ की छांव में
फर्क करना सिखाना”
यही मानवता का तकाजा भी है और अभी के जीवन की अनिवार्यता भी. राही प्रेम के भी अद्भुत कवि हैं. उनकी कविताओं के इस पक्ष को जरूर लक्षित किया जाना चाहिए. पर प्रेम की उपस्थिति भी वहां पारंपरिक या फैशन के मुताबिक नहीं है. उनके यहां प्रेम भी अपना ही लहजा अख्तियार करता है. कवि की ये पंक्तियां देखिए और प्रेम के नायाब हो जाने या एक नायाब प्रेम के होने पर विस्मित होइए –
“ आज
फिर से तुम पर
नहीं लिख पाया कुछ
लिखना शुरू करूं
तो जंगल में भागती
पगडंडी हो जाती हो तुम”
अब बताइए, भला जंगल डरने की कोई चीज हो सकता है ? प्रचलित अर्थों में ‘जंगली’ हो जाने का कोई मान है भला ? कितना खूबसूरत है कवि का याद करने का यह तरीका जिसमें याद करने से अमरूद की मिठास से मुंह भर जाए और चिड़ियों की चहचहाहट से गूंजने लगे मन ! यह कवि राही डूमरचीर का तरीका है, जहां प्रेम नई-नई अभिव्यक्तियों से गमक उठता है. जिसमें ‘आसमान को तकती है घास, महुआ से मिलने की आस में’. जब कवि याद करता है ‘बसन्त की थाप पर मांदर की गूंज’,और ‘महुए की गंध के साथ पलाश का फूल’ और जब वह कहता है ‘जैसे खूब साफ आसमान का कोई तारा हमारा हो जाता है’- हम उसे पढ़ते हुए पाते हैं कि हमारे अंदर ही कहीं कुछ खिल उठा है. यह ‘खिल उठना’ वह भाव है जो पाठक बार-बार महसूस करता है ‘गाडा टोला’ में.
नई कविता, यानी छंद-मुक्त कविता को पढ़ते समय पाठक को एक काम करना जरूरी होता है, कविता की लय को पकड़ना. कविता का प्रवाह अगर ठीक-ठीक पकड़ में न आए, तो कविता न समझ में आएगी, न आनंद देगी. ‘गाडा टोला’ का प्रवाह स्वाभाविक रूप से पाठक की पकड़ में आ जाता है. एक पंक्ति से अगली पंक्ति पर जाने में कभी भी कोई अड़चन महसूस नहीं होती. ऐसा लगता है कि कवि ने कविता की पंक्तियों को इतनी बार पढ़ा है कि उनका सारा नुकीलापन और खुरदरापन मिट चुका है. इन कविताओं की पंक्तियां मांजी हुई पंक्तियां हैं. जैसे बरतन के मांजे जाने से उसके किनारे समतल हो जाते हैं, वैसे ही इन कविताओं की पंक्तियों के किनारे भी.
इस वजह से एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति पर जाने में पाठक कहीं अटकता नहीं. मांजे जाने का एक फायदा और होता है कि बरतन चमकने लगते हैं. इन कविताओं के विषय में भी कहा जा सकता है कि ये चमकती हुई पंक्तियां हैं. मुक्तिबोध अच्छी कविता के लिए स्वर (लहजा) को साधने की बात को बेहद ज़रूरी मानते थे. राही डूमरचीर भी इसके प्रति सजग कवि हैं. स्वर को साधने का अर्थ है अवलोकन और अभ्यास. कविता में आए पात्रों की भाषा के स्वर को भी राही बखूबी साधते हैं, जिससे उनकी कविता और भी ज्यादा प्रभावी हो जाती है. ‘एदेल किस्कू’ कविता की ये पँक्तियाँ, ‘स्वर को साधने’ का एक सुंदर उदाहरण हैं –
“बाबा के बाद कौन बचा था
जो घर चलाता
आयो का हालत तो जानते ही थे
तुम्हारा घर वाला बहुत मदद किया लेकिन
हमारी ही ज़मीन पर हमको रोज़गार दे दिया था
बदले में बचने भर भात-तरकारी भी दे देता था”
राही अपनी कविताओं में शब्दों को उनके सही अर्थ में बरतने के आग्रही हैं. कई बार शब्दों में चस्पां अर्थ सदियों से चले आ रहे पक्षपात, असमानता और अन्याय को अपने में समाहित किए रहते हैं लेकिन रोजमर्रा के जीवन में इतनी बेफिक्री से इनका इस्तेमाल किया जाता है कि किसी को इसका भान तक नहीं होता. राही का ध्यान इन बातों पर जाता है. इस संग्रह में दो मुहावरों ‘इज्जत का मिट्टी में मिलना’ और ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला’ का जिक्र इसी नजरिये से आया है. अपने नजरिये पर जमे रहना अच्छी बात है, लेकिन कवि को यह ध्यान रखना चाहिए कि अत्यधिक चिंतन कविता को भारी न बना दे.
संग्रह से गुजर चुकने की बाद कई कविताएं आपके साथ हो जाती हैं. ऊपर उल्लिखित कविताओं के साथ ‘दुमका’, ‘बहुत बारिश हुई थी लापुंग में’, ‘सोने न दिया जाए तो बुरा मान जाती है रात भी’, ‘गंगा किनारे बसे शहर में, ‘दारे उमुल’, ‘उगाए जाते रहे शहर’, पूछा गौरेया ने’, ‘लाक्षागृह में आदिवासी’ आदि ऐसी ही कविताएं हैं जिनका असर देर तक मौजूद रहता है.
राजकमल जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशक के यहां से प्रकाशित होना (वह भी पहला संग्रह), अपने-आप में एक मकाम है, और किसी मकाम पर पहुंचने से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है मकाम पर बने रहना. राही डूमरचीर इस बात को समझते होंगे.
(लेखक पूर्व बैंकर हैं, रांची में रहते हैं और फिलहाल स्वतंत्र लेखन करते हैं. कोलाहल से दूर खूब पढ़ने और चुपचाप उसके असर को दर्ज करने में यकीन रखते हैं.)
About the Author
निखिल वर्मा
एक दशक से डिजिटल जर्नलिज्म में सक्रिय. दिसंबर 2020 से News18Hindi के साथ सफर शुरू. न्यूज18 हिन्दी से पहले लोकमत, हिन्दुस्तान, राजस्थान पत्रिका, इंडिया न्यूज की वेबसाइट में रिपोर्टिंग, इलेक्शन, खेल और विभिन्न डे...और पढ़ें
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