देश की वो पहली महिला, जिन्होंने 9 लड़कियों संग बदल दी भारत की सूरत, खुद किया था अपने पति का दाह संस्कार
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Agency:Local18
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Savitribai Phule Information in Hindi: आज उस महान शख्सियत का जन्मदिन है, जिसे गुजरे हुए 128 साल गुजर चुके हैं. मगर अगर उनके द्वारा किए गए कई नेक काम आज भी भारत के इतिहास के पन्नों पर अमित छाप छोड़ते हैं. वह महान शख्सियत आज भी किसी न किसी रूप में हर किसी के जेहन में जीवित हैं. खास कर महिलाओं के जेहन में हम बात कर रहे हैं. भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जो एक समाज सुधारक और जुझारू क्रांतिकारी कवयित्री थीं.

नई दिल्ली. सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के नयागांव में एक दलित परिवार में 3 जनवरी 1831 को हुआ था. उनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मी था. सावित्रीबाई का विवाह बहुत ही छोटी उम्र में हो गया था. जब वह महज 9 साल की थीं, तब 1940 में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से कर दिया गया था. शादी के बाद वह अपने पति के साथ पुणे आ गईं. सावित्रीबाई फुले भारत की पहली शिक्षिका होने के साथ भारत के नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता, समाज सुधारक और मराठी कवयित्री रही हैं.
सावित्रीबाई फुले की कविता संग्रह
आपको जानकर हैरानी होगी कि केवल 23 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले ने अपनी पहली किताब ‘काव्य फुले’ लिखी थी, जो कि यह 1854 में छपी थी. ‘काव्य फुले’ एक काव्य संग्रह थी. इस संग्रह में उनके विरोध के स्वर साफ देखे गए थे. उन्होंने अपनी किताब में धर्म, धार्मिक पाखंडों, सामाजिक कुरीतियों और धर्मशास्त्र के खिलाफ जमकर लिखा था. इस किताब में उन्होंने औरतों की बुरी स्थिति के लिए धर्म, जाति और पितृसत्ता को जिम्मेदार ठहराया था और उनपर कड़ा प्रहार किया. महिलाओं के उत्थान और समाज में समानता लाना रही उनके जीवन का उद्देश्य रहा है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि केवल 23 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले ने अपनी पहली किताब ‘काव्य फुले’ लिखी थी, जो कि यह 1854 में छपी थी. ‘काव्य फुले’ एक काव्य संग्रह थी. इस संग्रह में उनके विरोध के स्वर साफ देखे गए थे. उन्होंने अपनी किताब में धर्म, धार्मिक पाखंडों, सामाजिक कुरीतियों और धर्मशास्त्र के खिलाफ जमकर लिखा था. इस किताब में उन्होंने औरतों की बुरी स्थिति के लिए धर्म, जाति और पितृसत्ता को जिम्मेदार ठहराया था और उनपर कड़ा प्रहार किया. महिलाओं के उत्थान और समाज में समानता लाना रही उनके जीवन का उद्देश्य रहा है.
सावित्रीबाई फुले का दूसरा काव्य-संग्रह ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ 1891 में छपा था. इस संग्रह में सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिराव फुले की परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी रूप में लिखा था.
“यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे तो फिर फिजूल शादी क्यूं रचाए नर नारी”. सावित्रीबाई फुले द्वारा लिखे गए इस एक पंक्ति से साफ है, वह लोगों के अंदर किस तरह का बदलाव देखना लाना चाहती थीं.
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“स्त्रियां केवल घर और खेत पर काम करने के लिए नहीं बनी है, वह पुरुषों से बेहतर कार्य कर सकती है.” महिलाओं की क्षमता कम आंकने वालों के लिए उनकी यह लाइन काफी सटीक बैठती है. वह महिलाओं को प्रखर, निर्भीक, चेतना संम्पन्न, तर्क शील, दार्शनिक मानती थीं.
गोबर-कीचड़ में सनी हुई जाती थीं स्कूल
सावित्रीबाई फुले को जो ख्याति मिली, उसे पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की. शिक्षा प्राप्ति से लेकर महिलाओं और दलित समाज को शिक्षा दिलाने तक की लड़ाई में कई बार अवहेलना का शिकार बनीं. आपको जानकर हैरानी होगी कि जब उन्होंने स्कूल जाने का फैसला किया तब उनके राह चलते लोग, उनके आस पास के लोग उनको बेहद बुरा शब्द कहते.
सावित्रीबाई फुले को जो ख्याति मिली, उसे पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की. शिक्षा प्राप्ति से लेकर महिलाओं और दलित समाज को शिक्षा दिलाने तक की लड़ाई में कई बार अवहेलना का शिकार बनीं. आपको जानकर हैरानी होगी कि जब उन्होंने स्कूल जाने का फैसला किया तब उनके राह चलते लोग, उनके आस पास के लोग उनको बेहद बुरा शब्द कहते.
पुणे में स्त्री शिक्षा के विरोधी उन पर गोबर फेंक देते थे. पत्थर मारते थे. हालांकि उनके इरादे मजबूत थे. वह इन मुसीबतों से निपटने के लिए हर दिन अपने बैग में एक्स्ट्रा साड़ी लेकर जाती थीं. क्योंकि वह हर दिन गोबर-कीचड़ में सनी हुई स्कूल पहुंचती थीं. स्कूल पहुंचकर वह अपनी साड़ी बदल लेती थीं.
9 विद्यार्थियों संग की स्कूल की शुरुआत
उस समय जब लड़कियों की शिक्षा पर सामाजिक पाबंदी बनी हुई थी, तब सावित्री बाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी. इस स्कूल की शुरुआत 9 बालिकाओं संग की थी. इसके बाद उन्होंने लड़कियों के लिए 18 स्कूलों की स्थापना की. महिला शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए सन् 1852 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सम्मानित किया था, सावित्री बाई के सम्मान में डाक टिकट तथा केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने उनकी स्मृति में कई पुरस्कारों की स्थापना की.
उस समय जब लड़कियों की शिक्षा पर सामाजिक पाबंदी बनी हुई थी, तब सावित्री बाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का सबसे पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी. इस स्कूल की शुरुआत 9 बालिकाओं संग की थी. इसके बाद उन्होंने लड़कियों के लिए 18 स्कूलों की स्थापना की. महिला शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए सन् 1852 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सम्मानित किया था, सावित्री बाई के सम्मान में डाक टिकट तथा केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने उनकी स्मृति में कई पुरस्कारों की स्थापना की.
पति का खुद किया था दाह संस्कार
सावित्रीबाई फुले समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की, जब उनके पति ज्योतिराव फुले की मृत्यु सन 1890 में हुई थी. उन्होंने सभी सामाजिक मानदंडों को आईना दिखाते हुए अपने पति का अंतिम संस्कार किया और उनकी चिता को अग्नि देकर अपने पति के सपनों को पूरा किया था. पति के निधन के बाद उन्होंने कभी खुद को अकेला नहीं महसूस होने दिया और अपने पति के अधूरे सपनों को पूरा करने में जुट गईं.
सावित्रीबाई फुले समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की, जब उनके पति ज्योतिराव फुले की मृत्यु सन 1890 में हुई थी. उन्होंने सभी सामाजिक मानदंडों को आईना दिखाते हुए अपने पति का अंतिम संस्कार किया और उनकी चिता को अग्नि देकर अपने पति के सपनों को पूरा किया था. पति के निधन के बाद उन्होंने कभी खुद को अकेला नहीं महसूस होने दिया और अपने पति के अधूरे सपनों को पूरा करने में जुट गईं.
पति के निधन के करीब 7 साल बाद वह प्लेग बीमारी के चपेट में आ गई. यह तब हुआ जब वह 1897 में महाराष्ट्र में फैले प्लेग बीमारी से पीड़ित लोगों की मदद करने निकल पड़ी, इस दौरान वे खुद भी प्लेग की शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को उन्होंने इस संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.
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