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उर्दू अदब की वो ‘ख़ुशबू’, जो आज भी फज़ाओं में महक बिखेर रही है: परवीन शाकिर
उर्दू अदब की वो ‘ख़ुशबू’, जो आज भी फज़ाओं में महक बिखेर रही है: परवीन शाकिर
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Agency:Local18
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Parveen Shakir Death Anniversary: भावनाओं की सच्चाई, नफ़ासत और लफ्ज़ों की नरमी के साथ परवीन ने उर्दू अदब में वो मुक़ाम हासिल किया, जहां आज तक शायद ही कोई दूसरी शायरा पहुंच सकी है.

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा!!
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा!!
वाकई वो एक फूल थीं, एक ऐसा फूल जिसकी खुशबू अदबी दुनिया के रहने तक तारी रहेगी. जिसकी शायरी पर अमजद इस्लाम अमजद ने कभी कहा था- “इनकी शायरी में एक लड़की की आवाज सुनाई देगी, एक ऐसी लड़की की आवाज जो खूबसूरत फूल चुनना भी जानती है और उन्हें गुलदान में सजाना भी.” ख़ुशबू, सदबर्ग और खुदकलामी की इस शायरा के बारे में जानकार कहते हैं- “उन्होंने अपनी शायरी में मोहब्बत के ज़ज़्बे की खूबसूरत व्याख्या की है”. उर्दू-अदब जिसे मोहब्बत की शायरा कहता है, हम और आप उसे परवीन शाकिर के नाम से जानते हैं.
महज 24 साल की उम्र में परवीन शाकिर का पहला काव्य संग्रह ‘ख़ुशबू’ मंज़र-ए-आम पर आया तो अदबी हलक़ों में धूम मच गई. देखते ही देखते इसकी हज़ारों कॉपियां बिक गईं और आज भी इसके खरीदार आपको मिल जाएंगे. खुशबू का टाइटल साबकैन नाम के एक मशहूर आर्टिस्ट ने बनाया था. एक बार फैज़ अहमद फैज़ साबकैन से मिलने उनके घर गए तो ख़ुशबू की एक कॉपी उनके टेबल पर रखी थी, फैज़ साहब ने किताब हाथ में उठाई और 350 पन्नों की इस किताब को देखते हुए बोले कि मैंने तो पूरे जीवन में इतनी नज़्में नहीं लिखीं हैं. इस पर साबकैन ने जवाब दिया- “परवीन शाकिर ज्यादा कहती है लेकिन अच्छा
कहती है.” अपने इसी संग्रह ख़ुशबू में परवीन ने लिखा है-
कहती है.” अपने इसी संग्रह ख़ुशबू में परवीन ने लिखा है-
अक्स-ए-खुशबू हूं बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई!!
कोई आहट कोई आवाज कोई चाप नहीं
दिल की गलियां बड़ी सुनसान हैं आए कोई!!
और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई!!
कोई आहट कोई आवाज कोई चाप नहीं
दिल की गलियां बड़ी सुनसान हैं आए कोई!!
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परवीन को शायरी विरासत में मिली थी, पिता शाकिर हुसैन साक़िब खुद भी एक शायर थे और बेटी परवीन की हौसला-आफज़ाई किया करते थे. परवीन के पहले संग्रह ‘ख़ुशबू’ में 9 साल की एक कम उम्र लड़की की रूमानियत और जज़्बात का जिक्र है जिसमें उसने अपनी निजी ज़िंदगी के अनुभवों को गहरी फ़िक्र और व्यापक कल्पना में भिगो कर औरत की भावनात्मक हालात को उकेरा है.
तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
मुझ पे एहसान हवा करती है!!
मुझ पे एहसान हवा करती है!!
चूम कर फूल को आहिस्ता से
मोजज़ा बाद-ए-सबा करती है!!
मोजज़ा बाद-ए-सबा करती है!!
खोल कर बंद-ए-क़बा गुल के हवा
आज ख़ुश्बू को रिहा करती है!!
आज ख़ुश्बू को रिहा करती है!!
परवीन की शायरी शबाब की मंज़िल में क़दम रखने वाली लड़की और फिर दाम्पत्य जीवन के बंधन में बंधने वाली औरत की कहानी है. उनके अशआर में नई पौध को एक सचेत संदेश देने की कोशिश है.
उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की!!
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की!!
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की!!
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की!!
परवीन शाकिर नए लब-ओ-लहजा की ताज़ा बयान शायरा थीं जिन्होंने मर्दों के परिप्रेक्ष्य में एक औरत के एहसासात और भावनाओं को बड़ी बारीकी से व्यक्त किया है. एक जगह परवीन ने लिखा है-
मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी
वो झूठ बोलेगा और ला-जवाब कर देगा!!
वो झूठ बोलेगा और ला-जवाब कर देगा!!
उनकी शायरी न तो रोने पीटने वाली पारंपरिक इश्क़ की शायरी है और ना ही खुलकर खेलने वाली रूमानी शायरी. भावना और एहसास की शिद्दत और उसकी सादा लेकिन कलात्मक व्याख्या परवीन की शायरी की खासियत है. परवीन की शायरी में हिज़्र और वस्ल की ऐसी कशमकश है जिसमें ना विरह मुकम्मल है ना ही मिलन.
उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी!!
मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूं गिरा भूल गया सवाल भी!!
अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी!!
मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूं गिरा भूल गया सवाल भी!!
भावनाओं की सच्चाई, नफ़ासत और लफ्ज़ों की नरमी के साथ परवीन ने उर्दू अदब में वो मुक़ाम हासिल किया, जहां आज तक शायद ही कोई दूसरी शायरा पहुंच सकी है. जानकार कहते हैं कि नई शायरी का परिदृश्य परवीन शाकिर के दस्तख़त के बिना अधूरा है. परवीन की शायरी की व्याख्या करते हुए उनके उस्ताद अहमद नदीम क़ासमी ने कहा था- “तमन्ना करने यानी इंतज़ार करते रहने के इस तिलिस्म ने होमर से लेकर ग़ालिब तक की तमाम ऊंची, सच्ची और खरी शायरी को इंसान के दिल में धड़कना सिखाया और परवीन शाकिर ने इस तिलिस्मकारी से उर्दू शायरी को सच्चे जज़्बों की इन्द्रधनुषी बारिशों में नहलाया है.”
यूं बिछड़ना भी बहुत आसां न था उस से मगर
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना!!
किस शबाहत को लिए आया है दरवाज़े पे चांद
ऐ शब-ए-हिज्रां ज़रा अपना सितारा देखना!!
आइने की आंख ही कुछ कम न थी मेरे लिए
जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना!!
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना!!
किस शबाहत को लिए आया है दरवाज़े पे चांद
ऐ शब-ए-हिज्रां ज़रा अपना सितारा देखना!!
आइने की आंख ही कुछ कम न थी मेरे लिए
जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना!!
परवीन शाकिर महिला शायरों में अपने अलहदा अंदाज और भावनाओं शब्दों में पिरोने की वजह से उर्दू शायरी को एक नई दिशा देती दिखती हैं. एक ओर तो उनका लहजा बेबाक है तो वहीं दूसरी ओर वो भावनात्मक अत्याचार और हिंसा के ख़िलाफ़ अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरो कर शे’र बना देती हैं.
क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला
ज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला!!
ज़िंदगी से किसी समझौते के बा-वस्फ़ अब तक
याद आता है कोई मारने मरने वाला!!
ज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला!!
ज़िंदगी से किसी समझौते के बा-वस्फ़ अब तक
याद आता है कोई मारने मरने वाला!!
परवीन की शख़्सियत में गज़ब का आत्मविश्वास था और ये उनकी शायरी में भी झलकती है.
बादबां खुलने से पहले का इशारा देखना
मैं समंदर देखती हूं तुम किनारा देखना!!
मैं समंदर देखती हूं तुम किनारा देखना!!
इसी आत्मविश्वास के सहारे उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी में हर तरह की मुश्किलों का मुकाबला भी किया. यहीं पर परवीन ये भी लिखती हैं कि –
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊंगी
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊंगी!!
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊंगी!!
सुपुर्द कर के उसे चांदनी के हाथों में
मैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊंगी!!
मैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊंगी!!
वो क्या गया कि रिफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गए
मैं किस से रूठ सकूंगी किसे मनाऊंगी!!
मैं किस से रूठ सकूंगी किसे मनाऊंगी!!
अब उस का फ़न तो किसी और से हुआ मंसूब
मैं किस की नज़्म अकेले में गुनगुनाऊंगी!!
मैं किस की नज़्म अकेले में गुनगुनाऊंगी!!
वो एक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन
मैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊंगी!!
मैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊंगी!!
परवीन शाकिर के 18 साल के अदबी अर्से में चार संग्रह ख़ुशबू, सदबर्ग, ख़ुदकलामी और इनकार दुनिया के सामने आए. लेकिन विडंबना देखिए कि उनका पहला समग्र संकलन ‘माह-ए-तमाम’ 1994 में छपा और इसी साल के आखिरी हफ्ते में एक सड़क हादसे में वो दुनिया से रुखसत हो गईं. जो दुनिया में आया है उसे एक-ना-एक दिन जाना जरूर है, लेकिन परवीन बहुत जल्दी चली गईं. लेकिन परवीन के लिखे और कहे अल्फाज़ उनके वजूद की गवाही आज भी दे रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे.
तभी तो परवीन ने लिख छोड़ा है-
तभी तो परवीन ने लिख छोड़ा है-
मर भी जाऊं तो कहां लोग भुला ही देंगे
लफ़्ज़ मेरे, मेरे होने की गवाही देंगे!!
लफ़्ज़ मेरे, मेरे होने की गवाही देंगे!!
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प्रभात पाण्डेयएडिटर,News 18 उत्तर प्रदेश- उत्तराखंड
प्रभात पाण्डेय अभी News18 उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में एडिटर (न्यूज़) हैं. डीडी न्यूज़ से पत्रकारिता का करियर शुरू करने वाले प्रभात पाण्डेय पिछले करीब 17 साल से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं. यूनिवार्ता, न्यूज़ 2...और पढ़ें
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