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Chholiya Dance: कुमाऊं के 'छोलिया नृत्य' का प्राचीन इतिहास, जानें कैसे मिला इसे ये नाम?

Chholiya Dance: कुमाऊं के 'छोलिया नृत्य' का प्राचीन इतिहास, जानें कैसे मिला इसे ये नाम?

Chholiya Dance of Kumaun: कुमाऊं में चंद वंश के शासन के समय में छोलिया नृत्य शान हुआ करता था. जबकि लोकनृत्य छोलिया को यह नाम 'छल' शब्द से मिला था.

रोहित भट्ट

अल्मोड़ा. उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है. जबकि दुनियाभर में यहां की संस्कृति और सभ्यता प्रसिद्ध है. आज भी यह राज्य अपने भीतर इतिहास के तमाम पन्नों को समेटे हुए है. कुमाऊं का लोकप्रिय छोलिया नृत्य (Chholiya Dance of Kumaun) यहां की युवा पीढ़ी को विरासत में मिला है. छोलिया नृत्य आपको विशेष रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में देखने को मिलता है. लोकनृत्य छोलिया को यह नाम ‘छल’ शब्द से मिला था.

कुमाऊं में चंद वंश के शासन के समय में छोलिया नृत्य शान हुआ करता था. बताया जाता है कि जब युद्ध के समय राजा जाया करते थे, तो लोग सफेद और लाल झंडा लेकर उनके साथ जाते थे. लाल ध्वजवाहक आगे और सफेद ध्वजवाहक पीछे चलता था. उनके बीच में छोलिया कलाकार चला करते थे. कलाकार ढोल, दमाऊ, मसकबीन, रणसिंघा और अन्य वाद्य यंत्रों को बजाकर जाते थे.

इस वजह से नाम पड़ा छोलिया
छोलिया नृत्य करने वाले कलाकारों का शारीरिक कौशल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उन्हें युद्धरत सैनिकों के उन दांव-पेंचों की नकल करनी होती है, जिसमें वे छल के माध्यम से शत्रु को परास्त करते हैं. इसी कारण इसे छोलिया (छलिया) नाम दिया गया.

छोलिया कलाकारों की एक टीम में करीब 10 से 15 लोग (अधिकतम 20) होते हैं, जो शादी-विवाह या फिर अन्य कोई भी शुभ कार्यक्रम में मनमोहक प्रस्तुति देते हैं. इसमें एक कलाकार गीत गाता है और अन्य कलाकार उस गीत को अपने वाद्य यंत्रों से जोड़कर बजाते हैं.

छोलिया टीम के कलाकार राजेंद्र राम ने बताया कि उनके पिता भी कलाकार थे. वह करीब 20 साल से छोलिया टीम का हिस्सा हैं. उनका बेटा भी कभी-कभी उनके साथ आता है. वह भी टीम का सदस्य है और उनका परिवार इसी तरह इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है. वे लोग जगह-जगह जाकर छोलिया नृत्य प्रस्तुत करते हैं. उत्तराखंड के अलावा वे कई राज्यों में छोलिया नृत्य कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि हम युवा पीढ़ी को यह कला सिखाना चाहते हैं.

सरकार की अनदेखी पड़ रही भारी
लोक कलाकार चंदन बोरा ने बताया कि कुमाऊं का यह छोलिया नृत्य विलुप्त होने की कगार में था, जिसको बढ़ाने का काम किया गया. साल 1995 से वह काम कर रहे हैं. इसके लिए कई कार्यशाला लगाई गईं और इन कलाकारों को जोड़ा गया. इसके अलावा देशभर के विभिन्न प्रांतों में जाकर हम अपनी प्रस्तुति देते हैं. अल्मोड़ा के छोलिया कलाकारों ने देश-विदेशों में धूम मचाई है, लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया. सरकार चाहे तो छोलिया नृत्य को और आगे बढ़ा सकती है.

Tags: Almora News

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