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भारत में शादी में गाली गीत...हास्य और स्वागत की यह प्राचीन परंपरा अब भी क्यों महत्वपूर्ण है?

बता द बबुआ लोगवा देत काहे गारी...शादी में क्यों गाई जाती है गाली गीत, यहां जानिए सदियों से चली आ रही परंपरा का महत्व

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Agency:Local18
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भारत की शादियों में गाली गीत की परंपरा हास्य और स्वागत का प्रतीक है. यह दूल्हा और परिवार के बीच अपनापन बढ़ाती है, रामायण काल से चली आ रही है और आज भी मिथिला में सांस्कृतिक विरासत के रूप में जीवित है.

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भारत जितना बड़ा देश है, उतनी ही यहां की संस्कृति और लोक परंपराएं समृद्ध हैं. हर राज्य की अपनी खास लोककला, रीति-रिवाज और त्योहार हैं. शादी-ब्याह के मौके पर निभाई जाने वाली रस्में भी अलग-अलग होती हैं. इनमें से एक परंपरा पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की खास पहचान है. यहां लड़की वालों की तरफ से शादी में लड़के वालों को गाली देने की परंपरा है. यह गाली अपमान के लिए नहीं बल्कि हास्य और स्वागत के लिए दी जाती है.
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Local18 चैनल से बातचीत में महंत स्वामी कामेश्वरानंद वेदांताचार्य ने बताया कि शादी में गाली देने की परंपरा भगवान राम और सीता से जुड़ी हुई है. जब भगवान राम अयोध्या से विवाह करने मिथिला गए वहां की महिलाएं दूल्हा और उसके सहयोगियों को गाली गीत गाकर स्वागत करती थीं. यह व्यंग्यात्मक और हास्यपूर्ण तरीका था जिससे सबका अभिमान कम होता और रिश्ता मधुर बनता.
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महंत जी बताते हैं कि शादी में गाली देना सिर्फ मजाक या अपमान नहीं है. यह दूल्हा और उसके साथियों के साथ हंसी-मजाक का माध्यम होता है. गाली गीतों से परिवार के बीच अपनापन बढ़ता है और रिश्ता मजबूत बनता है. जितने दूल्हे के नज़दीकी रिश्तेदार होते हैं उन्हें उसी हिसाब से गाली दी जाती है. यह परंपरा सांस्कृतिक रूप से समाज में आपसी संबंधों को मीठा बनाती है.
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कुछ विद्वान मानते हैं कि विवाह गारी की परंपरा रामायण काल से चली आ रही है. रामचरित मानस में इसका लिखा प्रमाण भी मिलता है. जब भगवान राम सीता को लेने जनकपुर पहुंचे तब वहां की महिलाएं गाली गीत गाकर उनका स्वागत कर रही थीं. भगवान राम ने इसे मुस्कुराकर स्वीकार किया. यह दर्शाता है कि यह रस्म सदियों से समाज में हास्य और स्वागत के प्रतीक के रूप में मौजूद रही है.                                                                                                       तोहरा से पुछु मैं ओ धनुषधारी,<br />एक भाई गोर काहे एक काहे कारी,<br />बता दा बबुआ लोगवा देत कहे गारी,<br />बता दा बबुआ ॥
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समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया है. शहरों में अब डीजे और ऑर्केस्ट्रा ने गाली गीतों की जगह ले ली है. भाषा प्रस्तुति और सामाजिक स्वीकार्यता बदल गई है. गांवों में यह परंपरा अभी भी कुछ हद तक जिंदा है. हालांकि सोशल मीडिया और व्यावसायिक कार्यक्रमों के चलते गाली गीत अब पुराने रूप में कम ही सुनाई देते हैं.
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फिर भी शादी में गाली गीत हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं. यह परंपरा न केवल हास्य और मनोरंजन देती है बल्कि परिवारों के बीच मिठास और अपनापन भी बढ़ाती है. कई लोकगायक और समुदाय इस परंपरा को संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे साबित होता है कि यह सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व की परंपरा है जो भारतीय शादियों की खास पहचान बनाती है. भारत के विभिन्न राज्यों में अपनी अपनी भाषा में यह परंपरा आज भी चल रही हैं.