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दूल्हा ही नहीं पहाड़ी शादियों में दुल्हन को भी पहनाते हैं मुकुट, जानें महत्व

सिर्फ दूल्हा ही नहीं पहाड़ी शादियों में दुल्हन को भी पहनाते हैं मुकुट, यहां जानिए मान्यताएं और महत्व

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Agency:Local18
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उत्तराखंड के इस पारंपरिक मुकुट में कागज, गत्ते, सुनहरे-सफेद झिलमिलाते कपड़े, रंगीन फूल, मोती, कलश, नारियल और देवी देवताओं के प्रतीक चिन्ह बने होते हैं. कई बार इसमें गणेश जी या शिव-पार्वती की तस्वीर भी लगाई जाती है ताकि विवाह मंगलमय हो.

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उत्तराखंड की पहाड़ी शादियों में परंपराएं केवल रस्में नहीं होतीं बल्कि संस्कृति और आस्था का सुंदर संगम होती हैं. इन्हीं परंपराओं में दूल्हा और दुल्हन को पहनाया जाने वाला ‘मुकुट’ विशेष महत्व रखता है. यह मुकुट सामान्य आभूषण नहीं बल्कि शुभता, समृद्धि और देवत्व का प्रतीक माना जाता है. शादी की शुरुआत में जब दूल्हा और दुल्हन को यह मुकुट पहनाया जाता है, तो माना जाता है कि वे देवतुल्य रूप में विवाह का संस्कार निभा रहे हैं.
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उत्तराखंड के इस पारंपरिक मुकुट में कागज, गत्ते, सुनहरे-सफेद झिलमिलाते कपड़े, रंगीन फूल, मोती, कलश, नारियल और देवी देवताओं के प्रतीक चिन्ह बने होते हैं. कई बार इसमें गणेश जी या शिव-पार्वती की तस्वीर भी लगाई जाती है, ताकि विवाह मंगलमय हो. मुकुट के ऊपरी हिस्से में कलश का आकार बनाया जाता है, जो समृद्धि और नए जीवन की शुरुआत का संकेत होता है.
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पहाड़ी शादियों में मुकुट को सिर्फ सजावट नहीं बल्कि आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है. माना जाता है कि दूल्हा और दुल्हन को मुकुट पहनाने से भगवान शिव, माता पार्वती और स्थानीय देवताओं का आशीर्वाद मिलता है. यह मुकुट उनके वैवाहिक जीवन में खुशहाली, प्रेम, सम्मान और स्थिरता का संदेश देता है. इस मुकुट में लगे नारियल और चावल शुभता और पवित्रता के प्रतीक होते हैं.
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मुकुट शादी की शुरुआत में तब पहनाया जाता है जब दूल्हा-दुल्हन पहली बार मंडप में पहुंचते हैं. यह मुकुट विवाह की मुख्य रस्मों तक पहना रहता है. सात फेरे, वरमाला और सिंदूर के बाद जब दूल्हा-दुल्हन वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं, तो पारंपरिक गीतों के बीच इसे उतारा जाता है. मुकुट उतारने का मतलब होता है कि देव रुपी विवाह संपन्न हो चुका है और अब जोड़ा सामान्य दांपत्य जीवन शुरू करेगा.
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उत्तराखंड के इस मुकुट में यहां की संस्कृति और लोककला की झलक साफ दिखाई देती है. इसमें अक्सर रंगीन फूल, रिंगाल की पतली लकड़ियां, पारंपरिक लाल-सफेद धागा और पहाड़ी डिज़ाइन शामिल किए जाते हैं. कई जगह पर महिलाएं यह मुकुट खुद अपने हाथों से बनाती हैं. इस मुकुट में ‘ऐपन’ कला के डिज़ाइन भी बनाए जाते हैं जो शुभ संदेश और पारंपरिक सौंदर्य का प्रतीक है.
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मुकुट पहनाने की रस्म केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह समाज की ओर से नवविवाहित जोड़े को सम्मान और शुभकामनाएं देने की परंपरा है. जब दूल्हा और दुल्हन मुकुट पहनकर आते हैं तो उन्हें देव रूप में माना जाता है. गांव की बुजुर्ग महिलाएं पारंपरिक मंगल गीत गाकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं.
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पहाड़ी शादियों में मुकुट पहनाने के दौरान लोकगीतों की गूंज माहौल को और भी पवित्र बना देती है. महिलाएं ‘मंगल’, ‘तुरैली’ और ‘ढोल दमाऊं’ की धुनों पर पारंपरिक गीत गाती हैं. इन गीतों में देवताओं का आह्वान, वर-वधू की प्रशंसा और नए जीवन की शुभकामनाएं शामिल होती हैं. मुकुट पहनाने के समय गाए जाने वाले गीत विवाह की पावनता को और गहरा बना देते हैं.
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