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पहाड़ों में शादी शुरू ही नहीं होती जब तक न हो जाए ये रहस्यमयी कंगन रस्म, वजह जानकर चौंक जाएंगे!
पहाड़ों में शादी शुरू ही नहीं होती जब तक न हो जाए ये रहस्यमयी कंगन रस्म, वजह जानकर चौंक जाएंगे!
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पहाड़ी क्षेत्रों की शादियां अपनी परंपराओं, आस्था और लोक मान्यताओं के कारण बेहद खास मानी जाती हैं. यहां की हर रस्म सिर्फ एक रीति नहीं बल्कि जीवन और संस्कृति से जुड़ी गहराई को दर्शाती है. इन्हीं परंपराओं में से एक है कंगण बंधन की रस्म. यह रस्म शादी से पहले दूल्हा और दुल्हन के लिए शुभ मानी जाती है जो उनके जीवन में आने वाले नए सफर की रक्षा करती है.
पहाड़ी क्षेत्रों की शादियां अपनी परंपराओं, आस्था और लोक मान्यताओं के कारण बेहद खास मानी जाती हैं. यहां की हर रस्म सिर्फ एक रीति नहीं बल्कि जीवन और संस्कृति से जुड़ी गहराई को दर्शाती है. इन्हीं परंपराओं में से एक है कंगण बंधन की रस्म. यह रस्म शादी से पहले दूल्हा और दुल्हन के लिए शुभ मानी जाती है जो उनके जीवन में आने वाले नए सफर की रक्षा करती है. इस रस्म का संबंध सुरक्षा, आशीर्वाद और संस्कारों से जुड़ा होता है. पहाड़ों में कंगण बंधन को सुख, समृद्धि और बुराई से रक्षा का प्रतीक माना गया है.
गढ़वाल क्षेत्र में कंगण बंधन की रस्म मंगल स्नान के बाद की जाती है. दूल्हा और दुल्हन पूजा के बाद शुद्ध माने जाते हैं और इसी पवित्रता के साथ उनके हाथ पर कंगण बांधा जाता है. इसे रक्षा सूत्र की तरह माना जाता है जो जीवन के नए अध्याय की शुरुआत से पहले उन्हें हर बुरी नजर से बचाता है. कंगण बांधते समय परिवार के बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं और मंगलकामना करते हैं कि उनका वैवाहिक जीवन खुशियों से भरा रहे. यह रस्म दूल्हा और दुल्हन के लिए आध्यात्मिक सुरक्षा कवच मानी जाती है.
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कुमाऊं में कंगण बंधन की रस्म और भी विस्तृत होती है. यहां सिर्फ दूल्हा या दुल्हन ही नहीं बल्कि उनके परिवार के कई सदस्य भी इस रस्म का हिस्सा बनते हैं. माना जाता है कि शादी सिर्फ दो लोगों का नहीं बल्कि दो परिवारों का पवित्र बंधन होता है. इसलिए सुरक्षा और शुभ आशीर्वाद पूरे परिवार के लिए जरूरी माना जाता है. कुमाऊं में कंगण बांधने को पारिवारिक एकता और सामूहिक मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है. इस रस्म के दौरान सभी लोग एक साथ बैठकर पूजा और आशीर्वाद का हिस्सा बनते हैं.
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कंगण बंधन के बाद पहाड़ी समाज में कई तरह की पारंपरिक मान्यताएं लागू हो जाती हैं. जैसे कंगण बंधने के बाद व्यक्ति नदी को आर-पार नहीं कर सकता, पेड़ पर नहीं चढ़ सकता और मांसाहार नहीं खा सकता. माना जाता है कि ऐसा करने से शुभ कार्य में बाधा आ सकती है. इस अवधि को शुद्धता का समय माना जाता है जब व्यक्ति को पूर्ण रूप से शांति, नियम और आस्था का पालन करना होता है. इन मान्यताओं का उद्देश्य मानसिक और आध्यात्मिक रूप से विवाह संस्कार के लिए तैयार होना है.
कंगण बंधन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी बहुत विशेष होती है. इसमें चावल, कुछ सिक्के, हल्दी मिला आटा यानी पिठवा और पीले रंग का कपड़ा शामिल होता है. इन वस्तुओं को शुभ, समृद्धि और सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है. पीले कपड़े में बांधा गया रक्षा सूत्र बुरे प्रभावों को दूर करता है. चावल शांति और पवित्रता का प्रतीक होते हैं जबकि सिक्के धन और सुख का आशीर्वाद दर्शाते हैं. इन सभी सामग्रियों का मेल एक शुभ जीवन की ओर संकेत करता है जहां परंपरा और आस्था दोनों साथ चलते हैं.
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गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही जगह कंगण बंधन को लेकर कुछ मान्यताएं समान हैं. दोनों क्षेत्रों में इस रस्म को शुभ, संरक्षक और अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. फर्क सिर्फ इतना है कि गढ़वाल में यह रस्म दूल्हा या दुल्हन तक सीमित रहती है जबकि कुमाऊं में पूरा परिवार इसका हिस्सा बनता है. दोनों ही जगह इस रस्म के दौरान मंत्रोच्चार, पूजा और आशीर्वाद अनिवार्य होते हैं. यह रस्म सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि पहाड़ी संस्कृति का आध्यात्मिक स्वरूप भी है जो समय के साथ और भी मूल्यवान होता जा रहा है.
कंगण बंधन का उद्देश्य सिर्फ बुरी शक्तियों से रक्षा करना नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से मजबूत करना भी होता है. यह रस्म युवाओं को अपने पारंपरिक मूल्यों की ओर आकर्षित करती है और उनके भीतर सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करती है. इस रस्म में परिवार, परंपरा और संस्कार की गहरी छाप दिखाई देती है. यह माना जाता है कि जब तक कंगण हाथ में बंधा रहता है तब तक व्यक्ति शुभ कार्य का हिस्सा होता है. यह स्मरण दिलाता है कि वह एक पवित्र और जिम्मेदार भूमिका निभाने जा रहा है.
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