एकदम सही पड़े RBI के पत्ते! गांवों से आ रही अच्छी खबरें, आर्थिक मंदी का कोई डर नहीं
भारत में इस वक्त कैश फ्लो की बहार देखी जा रही है. गांवों में नकदी की बहार आई हुई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान दिख रही है. बैंक जमा से लेकर लोगों की जेब तक, हर तरफ पैसा ही पैसा नजर आ रहा है, जो नीतिगत ढील, बढ़ती खपत और सरकारी योजनाओं का असर है.
नई दिल्ली. भारत में इस कैश फ्लो बहुत ज्यादा देखा जा रहा है. शहरों के साथ ही गांवों में इन दिनों नकदी की नदियां बह रही हैं. बैंकों की जमा राशि से लेकर लोगों की जेबों तक, हर जगह कैश फ्लो की रफ्तार तेज हो गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जून तिमाही के अंत तक बैंकों के चालू और बचत खातों में जमा राशि 3.79 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई है, जो बीते साल से दोगुनी है. वहीं आम लोगों के पास मौजूद नकदी 31,000 करोड़ से बढ़कर 91,000 करोड़ रुपये हो गई है. नकदी के इस तेज प्रवाह के पीछे आरबीआई की नीतिगत ढील, ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में तेजी और कर राहतों से लोगों की जेब में बचत बढ़ना प्रमुख कारण माने जा रहे हैं.
गांवों से उठी इकोनॉमी में रफ्तार
एक्सपर्ट्स का मानना है कि नकदी में ये बढ़ोतरी केवल नीतियों की ही देन नहीं है, बल्कि असली कहानी ग्रामीण इकोनॉमी में हो रहे बदलाव की है. आंकड़ों से साफ है कि वित्तीय वर्ष 2025 की चौथी तिमाही से ही ग्रामीण खपत में उछाल देखा जा रहा है, जिससे नकदी बढ़ी है. आरबीआई के ओपन मार्केट ऑपरेशन के जरिए सिस्टम में कैश की लिक्विडिटी भी बढ़ी है. ये सभी ग्रामीण इकोनॉमी की मजबूती का संकेत है. फसलों का बेहतर उत्पादन, मनरेगा जैसी योजनाओं से बढ़ी मजदूरी और जनधन खातों में सीधे ट्रांसफर हुई सरकारी सब्सिडी ने गांवों में नकदी पैसों की आवाजाही को नई गति दी है.
ट्रैक्टर, FMCG और नौकरियों का ग्राफ चढ़ा
गांवों में बढ़ती अमीरी के संकेत ट्रैक्टर और टू-व्हीलर की बिक्री में भी साफ नजर आ रहे हैं. वित्तीय वर्ष 2026 में ट्रैक्टर बिक्री 10 लाख यूनिट के रिकॉर्ड को छू सकती है, जो ग्रामीण मांग में इजाफे को दिखाता है. साथ ही, बेरोजगारी दर में कमी आई है. जून में ग्रामीण बेरोजगारी 5.1 फीसदी से घटकर 4.9 फीसदी रह गई है. नौकरियों के मोर्चे पर भी उत्साहजनक संकेत हैं. छोटी दुकानें, रिपेयर का काम, सर्विस सेक्टर जैसे खुदरा काम करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है.
ग्रामीण कंज्यूमर बढ़ा
ग्रामीण इलाकों में उपभोग की वापसी साफ दिख रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार, 112 जिलों में प्रति व्यक्ति आय सालाना 2000 डॉलर को पार कर चुकी है, जिनमें दक्षिण भारत के कुछ जिले सालाना 5000 डॉलर से भी आगे निकल चुके हैं. इसका मतलब है कि गांवों के लोग अब सिर्फ बुनियादी नहीं, बल्कि ब्रांडेड और गैर-जरूरी चीजों पर भी खर्च कर रहे हैं. एफएमसीजी सेक्टर में ग्रामीण बाजार की रफ्तार शहरों से चार गुना तेज है. छोटे शहर और गांवों में एफएमसीजी कंपनियों की बिक्री 8.4% की दर से बढ़ी है, जबकि शहरों में यह सिर्फ 2.6% रही.
गांवों का नया चेहरा
आज का ग्रामीण भारत सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं है. सर्विस सेक्टर– जैसे होटल, फाइनेंस सर्विस और रियल एस्टेट भी गांवों की इकोनॉमी को नई दिशा दे रहे हैं. यही कारण है कि कई छोटे निर्माता भी अब तेजी से बढ़ रहे हैं. भारत के गांव अब केवल खेती या सरकारी योजनाओं पर निर्भर नहीं हैं. वे आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं, और यह नकदी प्रवाह उस आत्मविश्वास का प्रमाण है. अगर यह रफ्तार बनी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था की असली ताकत उसके गांव ही होंगे. ये एक नया भारत है, जहां समृद्धि की बुनियाद खेतों से निकलकर बाजारों तक पहुंच रही है.
