Explained: क्या अमेरिका और रूस के बीच दोबारा Cold War के हालात बन रहे हैं?
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की विदेश नीति (foreign policy of Joe Biden) अलग है. वे चीन को छोड़कर रूस (Russia) पर ज्यादा आक्रामक दिख रहे हैं. तो क्या दोनों महाशक्तियां दोबारा तनाव में आने वाली हैं? यहां समझिए.
नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की विदेश नीति पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अलग नजर आ रही है. ट्रंप का फोकस जहां चीन को घेरने पर था, वहीं बाइडन पहले ही दिन से रूस से नाराजगी जता रहे हैं. हाल ही में उन्होंने अपने बयानों से साफ कर दिया कि वे रूस की किसी भी आक्रामक बात का जवाब दोगुनी तेजी से देंगे.
क्यों भड़का है अमेरिका
गुरुवार को विदेश मंत्रालय की यात्रा के दौरान बाइडन ने सीधे शब्दों में कहा कि वे दिन बीत गए जब अमेरिका रूस की आक्रामक कार्रवाई के सामने झुकता था. ये सारा गुस्सा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विरोधी एलेक्सी नवलनी की गिरफ्तारी को लेकर था. बाइडन ने रूस के आंतरिक मामले में घुसते हुए नवलनी को रिहा करने की मांग की. इसी दौरान उन्होंने ये बयान दिया.
तो ये तो हुआ ताजा मामला और नए राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया लेकिन इससे साफ हो चुका है कि बाइडन पुरानी अमेरिकी सोच के आधार पर अपनी विदेश नीति रखने जा रहे हैं, जिसके मुताबिक रूस ही अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है.
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क्या तनाव बढ़कर छद्म युद्ध बन जाएगा
हालात इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि रूस और अमेरिका के बीच का तनाव शीत युद्ध में बदलने की आशंका भी जताई जा रही है. तो क्या है शीत युद्ध और भारत पर इसका क्या असर हो सकता है, ये समझते हैं. शीत युद्ध दूसरे विश्व युद्ध के बाद के समय में हुआ राजनैतिक बदलाव था. इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) ने 1945 में किया था, जिसके बाद ये चलन में आया.
शीत युद्ध की शुरुआत दूसरे विश्न युद्ध के बाद हुई- सांकेतिक फोटो
क्यों शुरू हुआ ये युद्ध
शीत युद्ध के शुरू और खत्म होने की कोई नियत तारीख नहीं थी लेकिन ये 1945 से 1989 के बीच का दौर था. असल में तब तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका के बीच तनाव बहुत बढ़ गया था. इसके पीछे राजनैतिक विचारधारा को दोष दिया जाता है. जैसे अमेरिका में पूंजीवाद को माना जाता रहा, वहीं रूस में कम्युनिज्म को. दोनों ही ये मानते थे कि उनका सिस्टम ज्यादा बेहतर है. साथ ही वे आरोप लगाने लगे थे कि दूसरा देश अपने सिस्टम को हर जगह लागू करने की फिराक में है. यही बात तनाव का कारण बनी.
दो खेमों में बंटी दुनिया
इसकी शुरुआत दूसरे विश्न युद्ध के बाद हुई. अमेरिका और सोवियत संघ तब सबसे ताकतवर देश थे और उनके कहने का असर दूसरे देशों पर पड़ना ही पड़ना था. दोनों देश अपने तरीके से दूसरे देशों को चलाने की सोचने लगे. यूरोप को लेकर उनके बीच मतभेद था कि इसे कैसे बांटा जाए. विचारधारा की इस लड़ाई में अमेरिका के साथ ब्रिटेन और कई यूरोपियन देश आ गए. उन्होंने नाटो का गठन किया. वहीं सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के देशों के साथ मिलकर वॉरसा समझौता कर लिया.
रूस को नए राष्ट्र के तौर पर नई पहचान और सम्मान मिलना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका- सांकेतिक फोटो (pikist)
उनके बीच तनाव के इस वक्त को शीत युद्ध कहा जाता है. शीत इसलिए कहते हैं कि तनाव काफी ज्यादा होने के बाद भी सीधे-सीधे युद्ध नहीं हुआ. बल्कि ये विरोधी देश तकनीक और आर्थिक तौर पर एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश करने लगे.
तकनीकी तौर पर पछाड़ने की लगी होड़
स्पेस में सैटेलाइट भेजने की होड़ लग गई. परमाणु हथियारों की भी होड़ लग गई, जो अमेरिका और रूस में आज तक चली आ रही है. लड़ाई इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि दोनों ही अगुआ देश परमाणु शक्ति से लैस थे. ऐसे में जंग छिड़ना काफी भयावह हो सकता था. यही वजह है कि दोनों ध्रुव सीधे युद्ध में नहीं उलझे.
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गरीब देशों के कंधे पर चली बंदूक
इसी बजाय वे दूसरे गरीब देशों की आड़ लेते रहे. कांगो, कोरिया, इथियोपिया, सोमालिया जैसे देशों में तब लगातार गृह युद्ध के हालात थे. अमेरिका और रूस दोनों ने ही अपनी सेनाएं यहां हालात काबू रखने के नाम पर भेजीं. हालांकि हुआ उल्टा ही. वे सेनाएं आपस में लड़ने लगीं. इसके साथ ही वे एक-दूसरे के यहां जासूस भेजते और गोपनीय सूचनाएं निकालने की कोशिश करते ताकि नीचा दिखा सके.
इस तरह हुआ खत्म
सत्तर के दशक के आखिर में दोनों देशों के बीच तनाव कम होने लगे. कई तरह की संधियां हुई. अमेरिका ने रूस की विचारधारा वाले कम्युनिस्ट देश को संयुक्त राष्ट्र में शामिल किया. लेकिन शीत युद्ध के बंद होने की सबसे बड़ी वजह थी सोवियत संघ का टूटना और अफगानिस्तान में उसकी हार. आखिरकार नब्बे की शुरुआत में युद्ध खत्म हुआ माना जाने लगा.
अमेरिका और रूस की लड़ाई के बीच चीन लगातार समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाता गया- सांकेतिक फोटो
तब दोबारा तनाव क्यों आया
इसकी वजह एक बार फिर सोवियत संघ का विघटन है. इसके बाद रूस बना, जिसे कायदे से नए राष्ट्र के तौर पर नई पहचान और सम्मान मिलना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका. बल्कि अमेरिका इसके बाद भी रूस पर संदेह जताता रहा. इसका फायदा चीन को मिला. अमेरिका और रूस की लड़ाई के बीच वो लगातार समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाता गया. नतीजा ये हुआ कि आज चीन भी सुपर पावर बनने की जंग में शामिल है.
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दोनों देशों की जंग में चीन का फायदा
चीन की इस बढ़ती ताकत को लगभग दशकभर पहले ही पहचाना गया. आज से 9 साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन को रोकने के लिए विदेश नीतियां कुछ बदलीं, जबकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी शुरुआत दो दशक पहले हो जानी चाहिए थी. अब अमेरिकी संसद चीन के आगे बढ़ने को और खासकर उसके आक्रामक रवैये को लेकर डरी हुई लगती है और नए सिरे से अपनी नीतियां बना रही है. हालांकि नए राष्ट्रपति बाइडन का चीन को लेकर झुकाव दिखता है. यही कारण है कि वे चीन को छोड़कर दोबारा रूस पर आक्रामक हो रहे हैं.
