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पहले जला… फिर फटा! साइंटिस्ट्स ने ब्रह्मांड में देखा 'मृत्यु का दोहरा विस्फोट'

क्या कोई तारा दो बार मर सकता है? पहले जला… फिर फटा! साइंटिस्ट्स ने देखा 'मृत्यु का दोहरा विस्फोट'

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Science News Today: वैज्ञानिकों ने पहली बार एक सफेद बौने तारे (व्हाइट ड्वार्फ) की दो चरणों में हुई विस्फोटक मृत्यु को देखा है. यह तारा पहले सामान्य रूप से मरा, फिर अपने साथी तारे से पदार्थ खींचकर 'चंद्रशेखर सीमा' (सूर्य के 1.4 गुना द्रव्यमान) तक पहुंचा और पूरी तरह फट गया.

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नई दिल्ली: हमने अब तक यही समझा था कि तारे एक बार जलते हैं, फिर बुझ जाते हैं. यानी उनका जीवन और मृत्यु दोनों तयशुदा हैं, एक बार की प्रक्रिया. लेकिन यूरोपीय अंतरिक्ष वेधशाला (ESO) की हालिया खोज ने इस सोच को हिला कर रख दिया है. वैज्ञानिकों ने एक ऐसे तारे की पहचान की है जो एक बार नहीं, दो बार फटा. यानी ‘डबल डेटोनेशन सुपरनोवा’. ये अब तक का सबसे चौंकाने वाला सबूत है कि एक तारा अपनी मृत्यु की प्रक्रिया में दो बार विस्फोट कर सकता है. यह खोज सुपरनोवा SNR 0509-67.5 के अवशेषों के विश्लेषण से हुई है, जो धरती से करीब 1.6 लाख प्रकाशवर्ष दूर स्थित है.

वैज्ञानिकों ने पहली बार ब्रह्मांड में ऐसा नजारा देखा है. Credit ESOP. Das et al. Background stars Hubble K. Noll et al.

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पहले समझिए कि तारे कैसे मरते हैं?

जब एक तारा अपने जीवन का अंतिम चरण पूरा करता है, तो वह अक्सर एक सफेद बौने (White Dwarf) में बदल जाता है. एक बेहद घना, छोटा और ठंडा तारा. अगर यह सफेद बौना एक और जीवित तारे की परिक्रमा करता है और उससे धीरे-धीरे हाइड्रोजन या हीलियम चुराना शुरू कर देता है, तो वह ‘स्टेलर वैम्पायर’ बन जाता है, यानी तारों की दुनिया का भूत. जैसे-जैसे उसका द्रव्यमान बढ़ता है, वह ‘चंद्रशेखर सीमा’ (Chandrasekhar Limit – 1.4 सूरज के बराबर द्रव्यमान) तक पहुंचता है और फिर एक जबरदस्त धमाके के साथ फट पड़ता है. इसे Type Ia Supernova कहते हैं.

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लेकिन अब क्या बदल गया?

नई खोज में सामने आया है कि कुछ सफेद बौने तारे चंद्रशेखर सीमा तक पहुंचे बिना ही फट सकते हैं. और वो भी दो बार. वैज्ञानिकों ने ESO की Very Large Telescope (VLT) और MUSE उपकरण की मदद से SNR 0509-67.5 सुपरनोवा के अवशेषों में दो स्पष्ट विस्फोटों के संकेत पाए हैं.

कैसे होता है ये दोहरा विस्फोट?

सबसे पहले, सफेद बौना अपने साथी तारे से हीलियम चुराता है. चुराई गई हीलियम सतह पर जमा होती जाती है, और फिर एकाएक फट पड़ती है. यह पहली डेटोनेशन होती है. इस बाहरी विस्फोट से एक झटका भीतर की ओर जाता है, जो कोर में पहुंच कर दूसरी और ज़्यादा शक्तिशाली डेटोनेशन को जन्म देता है, यही असली सुपरनोवा होता है. इस पूरी प्रक्रिया में सफेद बौना चंद्रशेखर सीमा तक पहुंचे बिना ही विस्फोट कर देता है. यानी पुरानी समझदारी को पूरी तरह बदलते हुए.

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क्यों है यह खोज बड़ी?

वैज्ञानिकों ने अब तक जितने भी Type Ia सुपरनोवा देखे हैं, वे एक ही विस्फोट के माने जाते थे. लेकिन SNR 0509-67.5 के अध्ययन में जो ‘फिंगरप्रिंट’ मिला है, वह साफ संकेत देता है कि वहां डबल डेटोनेशन हुआ था.

ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के प्रियम दास, जो इस स्टडी के प्रमुख वैज्ञानिक हैं, कहते हैं, ‘यह न सिर्फ वर्षों पुरानी पहेली को सुलझाने में मदद करता है, बल्कि ब्रह्मांड के बारे में हमारी मूल सोच को भी चुनौती देता है.’

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क्या इससे हमारे ब्रह्मांड को समझने का तरीका बदलेगा?

बिलकुल. Type Ia सुपरनोवा को वैज्ञानिक ‘Standard Candle’ के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इनकी रोशनी तय होती है, जिससे हम ब्रह्मांड में दूरी मापते हैं. लेकिन अगर इनमें डबल डेटोनेशन जैसी विविधता संभव है, तो इसका असर ब्रह्मांड की संरचना और विस्तार को मापने की हमारी पूरी प्रक्रिया पर पड़ सकता है.

About the Author

Deepak Verma
Deepak Verma is a journalist currently employed as Deputy News Editor in News18 Hindi (Digital). Born and brought up in Lucknow, Deepak's journey began with print media and soon transitioned towards digital. He carries more than 10 years of experience in the field with focus on New media. He has previously worked with Dainik Jagran, Indian Express group, TV9 Bharatvarsh, Navbharat Times and Zee News Hindi. His interests include Science, Geopolitics, Economics and Current affairs.
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