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मराठा आरक्षण को लेकर पसोपेश में हैं सभी पार्टियां, बस कर रही हैं ज़ुबानी जमाखर्च

मराठा आरक्षण को लेकर पसोपेश में हैं सभी पार्टियां, बस कर रही हैं ज़ुबानी जमाखर्च

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सभी पार्टियां कहीं न कहीं इसलिए मराठा आंदोलन का समर्थन कर रही हैं क्योंकि उन्हें डर है कि मराठा उनसे नाराज़ न हो जाएं लेकिन वो इस बात से भी डर रही हैं कि खुलकर सामने आने पर बाकी जातियां उनसे दूर न हो जाएं.

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महाराष्ट्र में इन दिनों मराठा आरक्षण की आग भड़क रही है और चारों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां इसमें उलझ गई हैं. लेकिन सभी पार्टियां इस मुद्दे को लेकर बयानबाज़ी तक ही सीमित हैं सक्रिय तौर पर कोई भी पार्टी कुछ नहीं कर रही. दरअसल हर पार्टी को ये डर सता रहा है कि अगर मराठा आरक्षण का समर्थन नहीं किया तो नुकसान होगा और अगर ज़्यादा समर्थन किया तो बाकी जातियां नाराज़ हो सकती हैं.

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बीजेपी के लिए तो ये स्थिति काफी मुश्किल भरी है. एक तो बीजेपी ने पहली बार गैर-मराठा और ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाया है इसलिए मराठा वैसे ही नाराज़ चल रहे हैं. इस वजह से अब सरकार मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के मराठों को और अधिक नाराज़ नहीं करना चाहती है.


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बीजेपी को पिछली बार मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में सेंध लगाने का मौका मिला था. इसलिए वो इस बार मराठों को नाराज़ नहीं करना चाहती. सीएम ने कह दिया है कि इस मामले में अदालत फैसला करेगी. इस तरह बीजेपी ने आरक्षण के लिए मना भी नहीं किया और मामले को टाल भी दिया.


मराठों की पार्टी कहलाने वाली एनसीपी के नेता शरद पवार खुलकर सामने आए और कोल्हापुर मे एक सभा में चले भी गये. हालांकि बाद में उन्हें अहसास हुआ कि इससे ओबीसी नाराज हो सकते हैं, तो उन्होंने तुरंत कह दिया कि मराठे हिंसक न हों और एनसीपी केवल मराठा नहीं बल्कि धनगर और मुस्लिम आरक्षण की भी बात करेगी. दरअसल, मराठा 16 फीसदी आरक्षण चाहते हैं तो धनगर यानी गड़रिया चाहते है कि उनको एसटी स्टेटस दिया जाए. मुस्लिम चाहते हैं कि उनको आर्थिक आधार पर 5 फीसदी आरक्षण मिले. अब पवार इसलिए संभलकर बोल रहे हैं.


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शिवसेना ने भी इसी तरह बयान देते हुए कहा कि केन्द्र संविधान में बदलाव करे और जिनको ज़रूरत हो उनको आरक्षण दे. उद्धव ने ये भी कह दिया कि जो आरक्षण है वो न बदला जाए बल्कि अलग से आरक्षण दिया जाए. उद्धव भी जानते हैं कि पचास फीसदी से ज्यादा आरक्षण देना संभव नहीं है फिर भी उन्होंने गेंद सरकार के पाले मे डाल दी है.


इस स्थिति में सबसे मुश्किल में कांग्रेस है. उसके सारे नेता मराठा हैं जबकि उसका बड़ा वोट बैंक मराठा के अलावा ओबीसी और दलित भी रहा है, इसलिए कांग्रेस भी यही कह रही है सरकार विशेष अधिवेशन बुलाकर प्रस्ताव पारित करे और कहे कि वो आरक्षण देने को तैयार है. कांग्रेस को डर है कि कहीं हरियाणा और गुजरात की तरह बीजेपी मराठा बनाम अन्य कर देगी तो फायदा बीजेपी का ही होगा.


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इस बीच हर शहर में मराठा आरक्षण बिना किसी नेता के चल रहा है और लगातार हिंसा हो रही है जिससे लोगों को खासी परेशानी हो रही है. सबसे बड़ा डर यही है कि अगर ये नेतृत्व विहीन आग फैल गई तो इसे कौन रोकेगा.

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