Bhojpuri: कतना विज्ञान सम्मत बा विक्रम संवत? पढ़ीं अउर जानीं

एह बात के इलिम बहुत कमे लोग के होई कि अपनो देश के एगो साल संवत् बा,जवना के विक्रम संवत कहल जाला. आईं ,तनी विचार कइल जाउ कि कतना तर्क संगत आ विज्ञान सम्मत बा ई विक्रम संवत? बदलाव प्रकृति के दस्तूर ह आ हरेक विध्वंस का बाद नया निरमान होला.

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  • Last Updated: April 15, 2021, 2:50 PM IST
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अंगरेजी आ अंगरेजियत के रंग में रंगाइल एकइसवीं सदी के नवही पीढ़ी के बखूबी पता बा कि ईस्वी सन् 2021में हमनीं के जी रहल बानीं जा आ हरेक पहिली जनवरी के नया साल के शुरुआत धूमधाम से मनावल जाला. बाकिर एह बात के इलिम बहुत कमे लोग के होई कि अपनो देश के एगो साल संवत् बा,जवना के विक्रम संवत कहल जाला. आईं ,तनी विचार कइल जाउ कि कतना तर्क संगत आ विज्ञान सम्मत बा ई विक्रम संवत? बदलाव प्रकृति के दस्तूर ह आ हरेक विध्वंस का बाद नया निरमान होला. पुन्नश्लोक सिपाही सिंह श्रीमंत के कहनामो रहे-

गुमसुम-गुमसुम तनिको ना भावे हमें

आन्हीं हईं आन्हीं, अन्हाधुन हम मचाइंले,

नास लेके आवेलीं कि नया निरमान होखे
नया भीत उठेला, पुरान भीत ढाइंले!

अब ईस्वी सन् विचार करीं. पहिल जनवरी से जब साल शुरू होला,त अपना देश के माहौल में कवनो बदलाव ना आवे. सउंसे जनसमुदाय हाड़तोड़ जाड़ के सांसत झेलत ठंढ में सिकुड़ रहला आ प्रायः शीतलहरी के प्रकोपो झेलेला.

दोसरा ओरि, अपना भारत में फगुआ के पूर्व संध्या पर सम्मत जराके ओह साल के विदाई दियाला आ नयका साल के अगुवानी में पुआ-पकवान खात, फगुआ-चइता गावत चारू ओरि खाली मौज-मस्ती आउर हंसी-खुशी के वातावरण लउकेला.



एकरा पहिलहीं प्रकृति आ मौसम में बदलाव हो जाला. पतझड़ में फेंड़-खूंट पुरान पतई झारिके नया कोंपड़,टूसा आउर गमगमात फूलन से सजल ऋतुराज बसंत के स्वागत में ठाढ़ रहेलन स. धरती के बसंती चुनरी लहराए लागेले.लखरांव में आम के मोजर से मधुरस टपके लागेला.

कोंचिआइल महुआ के फूल के पथार महुआबारी में मादक बहार ले आवेले. ओने आम के मोजर में टिकोढ़ा लागि जाला आ कोइलर के कूक मीठ रस घोरे लागू लागेले. अइसना खुशगवार माहौल में चइत अंजोरिया के एकम(प्रतिपदा) से नया साल के विक्रम संवत के शुरुआत धूमधाम से होला-भक्तिभाव से भरल-पुरल नवरातन से. कुदरती साज-सिंगार से सजल-धजल मधुमास के ई बसंती नवरातन शक्ति परब का रूप में मनावल जाला,जवना में दुर्गा के नवो रूप के आराधना का जरिए अपना आंतर में पइसल शक्ति संचित करेके उतजोग होला.

चइत सुदी एकमे से काहें?

सवाल उठत बा कि चइत महीना के अंजोर पख के प्रतिपदे से काहें विक्रम संवत के समहुत होला? अइसन मान्यता बा कि चइत सुकुल एकमे का दिने सतजुग में ब्रह्माजी सृष्टि के सिरिजना के सिरीगनेस कइले रहनीं.ओही के इयाद में विक्रम संवत के नया बरिस शुरू होला-

चैत्र मासि जगत ब्रह्मा सगृज प्रथमेऽह्नि

शुक्ल पक्ष समग्रन्तु तथा सूर्योदये सति.

त्रेता युग में श्रीराम के राज्याभिषेक एही पख में भइल रहे.वनवासी राम-लखन वन-नर(वानर) के संगठन बनाके तमाम बुराइयन में लिप्त राकसन से सफाया कऽके अजोधा में रामराज के स्थापना कइले रहलन. द्वापर में महाभारत का बाद धरम के विजय पताका एही घरी फहरावल गइल रहे. कलियुग में विक्रम संवत के शुरुआत ओही ऐतिहासिक स्मृतियन के कारन होला.

नांव विक्रम संवत काहें?

भोजपुरी में एगो कहाउत प्रचलित बा-अनका धन पर विकरम राजा! माने,अइसन केहू,जे दोसरा के दौलत का भरोसे खुद के विकरम राजा समुझे! खैर, ऊ विकरम राजा रहलन चक्रवर्ती महाराज विक्रमादित्य, जेकरा नांव पर विक्रम संवत रखाइल रहे. हालांकि एह संवत के स्थापना का घरी महाराज का ओरि से 'कृत संवत' नांव दिहल गइल रहे, बाकिर राजा के पुन्न प्रताप के बदउलत विक्रम संवत नांव मशहूर भइल.

संवत के नांव ओही चक्रवर्ती महाराज के नांव प राखेके परिपाटी रहल बा, जे अपना राज के तमाम जनता के करजा खुद के निजी कोष से भरपाई कऽके ओतना राशि के स्वर्ण मुद्रा राजकीय कोष में जमा करे.

एही आधार पर राजा विक्रमादित्य के नांव प विक्रम संवत के शुरुआत भइल.

चक्रवर्ती महाराज विक्रमादित्य

विक्रमादित्य सही माने में चक्रवर्ती नरेश रहलन. अजातशत्रु रहलन ऊ.सउंसे दुनिया में उन्हुका जस के डंका बाजत रहे. आम जनता के ऊ जनार्दन मानत रहलन आ विद्वानन के अपना जानो से बढ़िके मान-सम्मान देत रहलन. राजा विक्रमादित्य के दरबार के नौ रतन रहलन-महाकवि कालिदास, नामी साहित्यकार अमर सिंह, न्यायविद दर्शन शास्त्री क्षपणक, चिकित्सा पद्धति के जनक धनवंतरि, व्याकरणाचार्य वररुचि, नीतिकार वेताल भट्ट, कविवर घटकर्पर, अंतरिक्ष विज्ञानी वराहमिहिर आ शिक्षा शास्त्री शंकु.

कालचक्र

समय के चक्का अविराम गति से चलत रहेला.श्रीमद्भागवत पुराण में राजा परीक्षित के शुकदेव मुनि से सवाल रहे-'काल का हऽ?'

महामुनि के कहनाम रहे कि काल एगो अमूर्त तत्व ह आ जब विषय के बदलाव होला,त आकार लेला, फेरु अव्यक्त के व्यक्त करेला.

सुरुज आ चनरमा के चाल प आधारित विक्रम संवत के कालगणना दुनिया के सभसे व्यापक कालगणना मानल गइल बा. ई तथ बतावल गइल बा कि मौजूदा कलियुग के मियाद चार लाख बत्तीस हजार साल के बा. एकरा दोगिना समय द्वापर युग के रहल बा. त्रेता युग कलियुग से तिगुना आ सतयुग चौगुना अवधि ले चलल बा.

ईस्वी सन् से प्राचीन आ प्रामाणिक

सन् 1952में डॉ मेघनाथ साहा के अध्यक्षता में एगो 'कैलेण्डर रिफॉर्म कमेटी ' बनल रहे, जवन राष्ट्रीय पंचांग का बिसे में आपन रिपोट देत विक्रम संवत के सभसे अधिका प्रामाणिक आ विज्ञान सम्मत बतवले रहे आ ईस्वी सन् के कई गो खामी आउर विसंगति का ओरि धियान दियवले रहे. विक्रम संवत के कालगणना हरेक कोन से वैज्ञानिक साबित भइल रहे. बाकिर अंगरेजी आ अंगरेजियत के हिमायती सरकार ओह रिपोट के ठंढा बस्ता में डालि देले रहे. विक्रम संवत भारत के गौरवशाली विरासत के प्रतीक बा आ एमें दनुजता के दमन आ मनुजता के विजयी भाव छिपल बा. एकरा कालचक्र के प्रवर्तक महादेव शिव के मानल जाला, जे खुदे महाकाल रहलन. राजा विक्रमादित्य वसुधैव कुटुंबकम् के भाव से लैस एह भूंइ के माई आ खुद के धरती के बेटा मानत कहले रहलन-

माता भूमि: पुत्रोऽहम् पृथ्विया:.

इहे वजह बा कि आजुओ हमनीं के तमाम संस्कारिक अनुष्ठान ईस्वी सन् से 57साल जेठ विक्रमे संवत से संचालित होला. खुद पर गर्व करेवाला के अपना देश, इहां के संस्कृति प गर्व होखे के चाहीं.अखियान करीं, विक्रम संवत 2078तेरह अप्रैल से शुरू हो चुकल बा. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
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