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लोकसभा चुनाव 2019: क्या पिछड़ों के सहारे आगे बढ़ेंगे राजनीतिक दल!

लोकसभा चुनाव 2019: क्या पिछड़ों के सहारे आगे बढ़ेंगे राजनीतिक दल!

दलित-मुस्लिम सियासत की तरह ही ओबीसी जातियां सत्ता तक पहुंचने की आसान कुंजी मानी जाती हैं.

दलित-मुस्लिम सियासत की तरह ही ओबीसी जातियां सत्ता तक पहुंचने की आसान कुंजी मानी जाती हैं.

मंडल कमीशन के मुताबिक ओबीसी की आबादी 52 फीसदी है. इसमें पांच हजार से अधिक जातियां हैं. क्या कभी ये जातियां राजनीतिक तौर पर एकजुट थीं जो अब सभी पार्टियां इस वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए जोर लगा रही हैं?

    कांग्रेस ने सोमवार को तालकटोरा स्टेडियम में पिछड़ा वर्ग महाधिवेशन आयोजित किया, जिसे राहुल गांधी ने संबोधित किया. यह 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर पिछड़े वर्ग के वोटरों को लुभाने का एक अहम कदम माना जा रहा है. सियासत में संख्या बल सबसे महत्वपूर्ण होता है और पिछड़ा वर्ग की आबादी सबसे ज्यादा करीब 52 फीसदी है. ऐसे में इस वर्ग के सहारे राजनीति में आगे बढ़ने की हसरत हर दल की है.

    दलित-मुस्लिम सियासत की तरह ही ओबीसी जातियां सत्ता तक पहुंचने की आसान कुंजी मानी जाती हैं. इसलिए हर पार्टी के नेता अपने-अपने फार्मूले से इस वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश में जुटे हैं. ओबीसी महाधिवेशन में राहुल ने कहा, "इस वर्ग में स्किल की कोई कमी नहीं है, उनमें हुनर भरा हुआ है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि यहां कौशल की कमी है. ये झूठ है." दूसरी ओर बीजेपी पिछड़ों में अति पिछड़ा खोजकर सियासी बाजी चल रही है.

    राजनीति के जानकार बताते हैं कि कांग्रेस में राजपूत, ब्राह्मण और मुस्लिम नेताओं का वर्चस्व रहा है. बीजेपी ने इसका भरपूर फायदा उठाया. उसने कभी कल्याण सिंह, उमा भारती के सहारे इस वोटबैंक को साधने की कोशिश की तो अब मौजूदा समय में नरेंद्र मोदी के सहारे सत्ता पर काबिज हुई, जो खुद को ओबीसी बताते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने गैर यादव वोटों में सेंध लगाने के लिए पिछड़े वर्ग के नेताओं को तवज्जो दी. अब इसी रास्ते पर राहुल गांधी भी निकल पड़े हैं. देखना होगा कि क्या पिछड़ा वर्ग को वो लुभा पाएंगे?

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    दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार का मानना है कि राहुल गांधी के लिए यह काम आसान नहीं है. कुमार कहते हैं "ओबीसी वोटरों को साधने की कोशिश राहुल गांधी बहुत देर से कर रहे हैं. गाड़ी छूट चुकी है, हालांकि कोशिश अच्छी है. कांग्रेस का दौर खत्म होने के बाद ओबीसी में यादवों का उभार हुआ, क्योंकि उनका संख्या बल अधिक था. इसके बाद अब कुर्मी और कुशवाहों का राजनीतिक उभार हो रहा है. जिनके पास संख्याबल और जमीन है. बीजेपी ने यह बात बखूबी समझी और इस वर्ग के नेताओं को तवज्जो देना शुरू किया. उसे इसका फायदा मिला. अखिलेश यादव और मायावती पहले से इस वोट बैंक को अपनी तरफ करने की कसरत करते दिख रहे हैं."

    सियासत में क्यों महत्वपूर्ण हैं ओबीसी?
    लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये 52 फीसदी आबादी कभी राजनीतिक तौर पर एकजुट थी जो अब सभी पार्टियां इस वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए जोर लगा रही हैं? ओबीसी में आने वाली जातियां राजनीतिक दलों के लिए क्यों इतनी महत्वपूर्ण हैं? हमने इन दोनों सवालों का जवाब सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार से तलाशने की कोशिश की.

    कुमार कहते हैं "जो संख्या में कम रहेगा वो ज्यादा एकजुट होता है. ओबीसी 52 फीसदी है, इसलिए इन्हें सियासी तौर पर एकजुट करना आसान नहीं. ओबीसी को दलित या मुस्लिम पॉलिटिक्स या वोटबैंक की तरह नहीं देखा जा सकता. क्योंकि ये एकत्र नहीं होते. फिर भी संख्या बल तो संख्या बल होता है. कोई लोकसभा या विधानसभा नहीं होगी जहां 40-45 फीसदी वोट पिछड़ों का न हो. इसलिए ये राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं."

    ओबीसी को लेकर सबसे ज्यादा प्रयोग यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में हुए हैं. इनमें सियासी तौर पर महत्वपूर्ण ओबीसी नेताओं को खासतौर पर बीजेपी ने आगे बढ़ाया है. केंद्र सरकार ने ओबीसी के सब-कटेगराइजेशन के लिए 2 अक्टूबर 2017 को एक आयोग का गठन किया है. यह आयोग तय करेगा कि ओबीसी में शामिल जातियों को क्या आनुपातिक आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है. आयोग तय करेगा कि ऐसी कौन सी जातियां हैं जिन्हें ओबीसी में शामिल होने के बाद भी आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिला और ऐसी कौन सी जातियां हैं जो आरक्षण की मलाई खा रही हैं. चार सदस्यीय इस आयोग की अध्यक्ष दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी हैं.

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    ओबीसी में विभाजन का किसे फायदा?
    तो पार्टियां कैसे ओबीसी वोटों को अपनी तरफ करने की कोशिश कर रही हैं? संजय कुमार का मानना है कि "2014 से ही पार्टियां ओबीसी को एक ब्लॉक के रूप में नहीं देख रही हैं. पार्टियों को पता है कि हर राज्य में ओबीसी के अपर सेक्शन हैं उसका झुकाव किसी न किसी पार्टी की तरफ पहले से है. उसे तोड़ पाना किसी के लिए मुश्किल होता है. जैसे यूपी में यादव हैं. इसलिए वहां वह गैर यादव ओबीसी को तोड़ने की कोशिश में है."

    "इसी तरह बिहार में गैर यादव, गैर कुर्मी ओबीसी को तोड़ने की कोशिश होगी. इसीलिए बीजेपी ने सब-कटेगराइजेशन के लिए जो आयोग बनाया है उसे हम ओबीसी को तोड़ने की कोशिश के तौर पर ही देख सकते हैं. इस आयोग को बनाने के पीछे बीजेपी ने अपना राजनीतिक माइलेज जरूर देखा होगा."

    पांच हजार से अधिक जातियों वाला समूह!
    इस समय ओबीसी में पांच हजार से अधिक जातियां हैं. 27 फीसदी आरक्षण में सभी ओबीसी जातियां आती हैं. लेकिन, माना जाता है आरक्षण का लाभ कुछ ही जातियों ने उठाया. बाकी सब हाशिए पर रहीं. हाशिए पर रहीं जातियों के अधिकारों की बात करके सियासी सीढ़ी आसानी से चढ़ी जा सकती है.

    हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, महाराष्ट्र में मराठा और गुजरात में पटेल जैसी जातियां खुद को ओबीसी में शामिल करने के लिए संघर्षरत हैं. इनमें से राजस्थान के गुर्जरों को छोड़कर बाकी सारी जातियां सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रुप से प्रभावशाली मानी जाती हैं. हरियाणा में तो जाट आरक्षण आंदोलन में तीस लोगों को जान चली गई थी. हालांकि, पिछड़े वर्ग से ही आने वाले कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी जाटों को पिछड़े वर्ग के 27 फीसदी आरक्षण में हिस्सेदारी देने की कोशिश के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं.

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    नौकरियों में न के बराबर हिस्सेदारी
    लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी की भागीदारी उनकी जनसंख्या के मुताबिक न के बराबर (17.31 फीसदी) है. कार्मिक विभाग की एक रिपोर्ट बताती है कि ग्रुप ए में सिर्फ 8.37, बी में 10.01 और सी में ओबीसी का प्रतिनिधित्व 17.98 फीसदी ही है. एनएसएसओ (2011-12) की रिपोर्ट बताती है कि ओबीसी के 36.6 फीसदी लोग खेती करते हैं.

    कांग्रेस सरकार में कम हो गई ओबीसी आबादी!
    कांग्रेस आज भले ही ओबीसी महाधिवेशन करवाकर पिछड़ा वर्ग की खैरख्वाह बनने की कोशिश कर रही हो लेकिन उसने अपने शासनकाल में ओबीसी की संख्या कम कर दी. मंडल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 1980 में भारत में ओबीसी की 52 फीसदी आबादी थी. यह रिपोर्ट 1931 की जनगणना पर आधारित थी. इसके बाद जातीय जनगणना के आंकड़े नहीं आए. जबकि एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन) ने 2006 में ओबीसी की जनसंख्या 41 और 2011-12 में 44 फीसदी बताई है.

    क्या इससे मजबूत होंगे पिछड़े?
    फिलहाल तो मोदी सरकार पिछड़ों को साधने के लिए कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती. केंद्र सरकार ने मार्च 2017 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) को भंग कर दिया था. इसके बाद राष्ट्रीय आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीएसईबीसी) के गठन को मंजूरी दी गई थी. नया आयोग सिविल कोर्ट की शक्तियों से लैस होगा. इस शक्ति से वह आरोपी को समन कर सकता है. सजा भी दे सकता है. जैसा कि राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग करता है.

    कोशिश सबकी जारी है
    पिछड़ी जातियों की सियासत करने वाली सपा लगातार छोटे-बड़े ओबीसी नेताओं से संपर्क कर रही है. बसपा ने ओबीसी खासतौर पर आरएस कुशवाहा को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कुछ ऐसा ही संदेश दिया है. पिछड़े वर्ग के ही रामअचल राजभर को राष्ट्रीय महासचिव बनाया है. यादवों और कुर्मियों के बाद ओबीसी में तीसरी प्रभावी जाति कुशवाहा, मौर्य, शाक्य, सैनी आदि मानी जाती है. कुशवाहा वोट बीएसपी को मिलते भी रहे हैं, लेकिन ओबीसी समुदाय पर ध्यान न देने के चलते इसे बीजेपी ने लपक लिया. इसलिए बसपा में फिर से उन्हें महत्व दिया जा रहा है. लालू-मुलायम-नीतीश से नाराज कई नेताओं को भाजपा में जाना बेहतर विकल्प लगा. क्योंकि वहां उन्हें महत्व मिला, जबकि लालू और मुलायम ने पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाने की जगह अपने परिवार के सदस्यों को स्थापित करने में जोर लगाया.

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    ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल और उपेंद्र कुशवाहा भाजपा गठबंधन में शामिल हुए. हालांकि, अब राजभर कह रहे हैं कि बीजेपी पिछड़ी जाति के नेताओं का सिर्फ इस्तेमाल कर रही है. स्वामी प्रसाद मौर्य सहित पिछड़े वर्ग के कई नेता भाजपा में शामिल हुए. केशव प्रसाद मौर्य को आगे बढ़ाया गया तो उसकी बड़ी वजह उनका ओबीसी होना भी माना जाता है. अखिलेश यादव भी कह रहे हैं वो अब सोशल इंजीनियरिंग कर रहे हैं. लेकिन देखना यह होगा कि उनकी पार्टी में कितने गैर यादव ओबीसी नेताओं को तवज्जो मिलती है.

    Tags: BJP, Congress, Narendra modi, Rahul gandhi

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