जन्मदिन विशेष: हरित क्रांति के जनक को मिला था नोबेल और पद्मविभूषण पुरस्कार

नॉर्मन बोरलॉग की किस्म से गेहूं (Wheat Crop) के उत्पादन में क्रांतिकारी बढ़ोत्तरी होना चमत्कार से कम नहीं था. (फाइल फोटो)

नॉर्मन बोरलॉग की किस्म से गेहूं (Wheat Crop) के उत्पादन में क्रांतिकारी बढ़ोत्तरी होना चमत्कार से कम नहीं था. (फाइल फोटो)

25 मार्च को ही हरित क्रांति (Green Revolution) के जनक नॉर्मन बोरलॉग (Narmon Borlaug) का जन्म हुआ था जिन्हें नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) के अलावा भारत के पद्मविभूषण से भी नवाजा गया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 25, 2021, 6:53 AM IST
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भारतीय अर्थव्यवस्था में हरित क्रांति (Green Revolution) की एक टर्निंग प्वाइंट के जैसी भूमिका है. हरितक्रांति ने देश की कृषि व्यवस्था (Agriculture) को तो प्रभावित किया ही, देश के आर्थिक स्थिति को भी एक नई दिशा प्रदान कर दी. 25 मार्च को हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलॉग (Narmon Borlaug) का जन्मदिन है. भारत में एमएस स्वामीनाथन ने बोरलॉग के साथ मिलकर ही हरित क्रांति की नींव रखी थी.

उनकी किस्मों ने बदल दिया कृषि को

बोरलॉग ने 1960 के दशक में कृषि क्षेत्र को ऐसे बदलाव दिए जिसने एक क्रांति का रूप ले लिया. उन्होंने गेहूं  की ऐसी किस्में बनाई जिसने विकासशील देशों में कृषि की पूरी सूरत ही बदल कर रख दी. उन्हें इस असाधारण क्रांति के लिए 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार के अलावा भारत में भी पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया.

बचपन से ही फसलों को  बर्बाद होते देखा
बोरलॉग की परवरिश अमेरिका के आयोवा में माता पिता के यहां कृषि के वातावरण में हुई. उन्होंने अपनी आंखों के सामने बहुत बार फसलों को बर्बाद होते  देखा था. उनके दादा ने उन्हें कृषि शिक्षा के लिए प्रेरित किया. 1960 के दसक में उन्होंने गेहूं की बीमारियों से लड़ने वाली किस्म का विकास किया और यह तथ्य खोज निकाला कि छोटे पौधे में बीज ज्यादा होगा.

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नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) की किस्मों ने गेंहू की उत्पादकता 70 प्रतिशत तक बढ़ा दी थी. (तस्वीर: Ben Zinner USAID via Wikimedia Commons)


भारत भी भेजीं अपनी किस्में



बोरलॉग अपने प्रयोग में सफल भी हुए और उनके बौने पौधे की किस्म लैटिन अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हो गई जिसके बाद उन्होंने इस किस्म को भारत भेजा. भारत में हरित क्रांति जनक वैज्ञानिक डॉक्टर एमएस स्वामीनाथन बोरलॉग के योगदान को बहुत अहम मानते थे. उनके मुताबिक, “वे भूख के खिलाफ संघर्ष करने वाले महान योद्धा थे. वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते थे कि अन्न गरीब तक जरूर पहुँचे ताकि दुनिया भर में कही भी कोई भी इंसान भूखा ना रहे.”

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भारत में बुलाया गया बोरलॉग को

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आइएआरआइ) के गेहूं कार्यक्रम से जुड़े सदस्य एमएस स्वामीनाथन ने मई 1962 में अपने निदेशक डॉ बीपी पाल को पत्र लिखकर बोरलाग को भारत बुलाने का आग्रह किया. उनके खत को कृषि मंत्रालय के पास भेज दिया गया. नतीजतन बोरलाग और उनके सहयोगी डॉक्टर रॉबर्ट ग्लेन एंडरसन यहां पर कृषि अनुसंधान के लिए मार्च, 1963 में आए.

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नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) की धान की किस्में भी बहुत ज्यादा उत्पादक साबित हुईं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


हरित क्रांति का नाम

बोरलॉग की तकनीकों का लाभ उठाकर भारत में अनाज उत्पादन की दर जनसंख्या वृद्धि की दर से तेज हो गई. 1968 में जीव विज्ञानी पॉल एरलिच ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'द पॉपुलेशन बम' में लिखा कि सभी को अन्न देने की मानवता की लड़ाई अब खत्म हो गई. उसी दौरान यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआइडी) के विलियम गौड ने बोरलाग के काम को 'हरित क्रांति' शब्द दिया.

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इसके बाद धान भी

गेहूं के बाद ही बोरलॉग ने उच्च उत्पादकता वाली धान की कुछ किस्मों का विकास किया, जो बाद के सालों में धान क्रांति का आधार बनीं. आज पूरी दुनिया में तकरीबन छह करोड़ हेक्टेयर जमीन पर गेहूं और धान के जो बीज बोए जाते हैं, वे बोरलॉग की ईजाद की हुई किस्में हैं. इनके बिना दक्षिण अमेरिका का एक बड़ा हिस्सा और चीन अपनी आबादी के लिए अनाज की आपूर्ति नहीं कर पा रहे होते.
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