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जब मंदिर को बचाने के लिए मुगल सेना से भिड़ गए नागा साधु, 40 हजार ने गंवाई जान

Naga Sadhus: जब काशी विश्वनाथ मंदिर को बचाने के लिए औरंगजेब की सेना से भिड़ गए नागा साधु, 40 हजार ने दी प्राणों की आहुति

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Naga Sadhus History: मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर पर किये गए हमले के दौरान लगभग 40,000 नागा साधुओं ने मंदिर की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी. जबकि साल 664 में पहला हमला नागा साधुओं ने विफल कर दिया था, लेकिन दूसरे हमले में औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसके स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया.

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जब मंदिर को बचाने के लिए मुगल सेना से भिड़ गए नागा साधु, 40 हजार ने गंवाई जानZoom
नागा साधुओं ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए ना केवल हथियार उठाए हैं, बल्कि अपने प्राणों की आहुति भी दी है.
Naga Sadhus History: नागा साधु हमेशा आम लोगों को सम्मोहित करते हैं. महाकुंभ मेले में भी नागा साधु आकर्षण का मुख्य केंद्र बने हुए हैं. नागा साधु ज्यादातर सभ्यता से अलग-थलग रहते हैं और बहुत कम ही सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं. कुंभ मेला उन दुर्लभ आयोजनों में से एक है, जहां आम लोगों को उन्हें देखने का मौका मिलता है. इस दौरान उन्हें आभूषणों, गहनों, त्रिशूल, डमरू और रुद्राक्ष की मालाओं से सजे मेला क्षेत्र में देखा जा सकता है. 

हजारों की संख्या में राख से लिपटे नागा साधुओं की तस्वीर, जो गेंदे की माला पहने हुए हैं, आनंद में चिल्लाते हुए और दशनामी संन्यासियों के विभिन्न अखाड़ों के विशाल झंडों, चिह्नों और बैनरों के नीचे मार्च करते हुए, गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर शाही स्नान के लिए जाते हैं. यह क्षण कुंभ मेले की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है और इसके बिना कोई भी तस्वीर अधूरी है. यह दुनिया के सामने भारत की आध्यात्मिक छवि भी प्रस्तुत करता है. 
धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाए
कुंभ में नागा साधु (तपस्वी) या नागा सबसे ज्यादा फोटो खिंचवाने वाले पंथ के सदस्य हैं, लेकिन उन्हें सबसे अलग समझा जाता है. लेकिन इन साधुओं ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए ना केवल हथियार उठाए हैं, बल्कि अपने प्राणों की आहुति भी दी है. इस तरह का एक जिक्र भारत के मध्यकालीन इतिहास में मिलता है जब उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब से लोहा लिया था. जैसा कि दावा किया जाता है कि औरंगजेब के शासनकाल में कई मंदिरों को ध्वस्त किया गया और उनकी जगह पर मस्जिदों का निर्माण करवाया गया.  
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नागा साधुओं ने बचाया विश्वनाथ मंदिर
इसी तरह इतिहास में एक जिक्र मिलता है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को भी ध्वस्त करने का प्रयास किया था. लेकिन वो नागा साधुओं की वजह से अपने इस काम में सफल नहीं हो सका था. औरंगजेब की मुगल सेना ने पहली बार साल 1664 में  काशी विश्वनाथ मंदिर पर हमला किया था. लेकिन नागा साधुओं ने मंदिर की रक्षा की और औरंगजेब की सेना को बुरी तरह शिकस्त दी थी. 
इतिहास की किताबों में मिलता है जिक्र
लेखक जेम्स जी. लोचटेफेल्ड की किताब ‘द इलस्ट्रेटेड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदूइज्म, के पहले खंड में मुगलों की इस हार का वर्णन मिलता है. जेम्स जी. लोचटेफेल्ड की इस किताब के मुताबिक, वाराणसी के महानिर्वाणी अखाड़े के नागा साधुओं ने औरंगजेब सेना का कड़ा मुकाबला किया था. इस युद्ध में नागा साधुओं की जीत हुई थी और मुगलों की हार. जेम्स जी. लोचटेफेल्ड ने इस ऐतिहासिक घटना को वाराणसी में महानिर्वाणी अखाड़े के अभिलेखागार (आर्काइव) में एक हाथ से लिखी किताब में देखा. उन्होंने इस घटना का वर्णन अपनी किताब में ‘ज्ञान वापी की लड़ाई’ के रूप में किया.
साल 1664 में औरंगजेब के काशी विश्वनाथ मंदिर पर इस हमले का जिक्र इतिहासकार जदुनाथ सरकार की किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ दशनामी नागा संन्यासियों’ में भी है. जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि नागा साधुओं ने धर्म और मंदिर की रक्षा के लिए भीषण युद्ध किया था. उनके अनुसार यह लड़ाई सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलती रही. अंत में दशनामी नागा साधुओं ने खुद को नायक साबित किया. 
40 हजार नागा साधुओं ने दी प्राणों की आहुति
काशी विश्वनाथ मंदिर पर पहला हमला विफल होने के बाद औरंगजेब ने चार साल बाद यानी 1669 में वाराणसी पर हमला किया. इस बार मुगल सेना ने मंदिर में जबर्दस्त तोड़फोड़ की. औरंगजेब जानता था कि मंदिर हिंदुओं की आस्था और भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए उसने ये सुनिश्चित किया कि इसे फिर से नहीं बनाया जा सके. उसने मंदिर की जगह पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया. ये मस्जिद आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है. स्थानीय लोककथाओं और मौखिक कथाओं के अनुसार, उस समय लगभग 40,000 नागा साधुओं ने काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी.
औरंगजेब ने सैकड़ों मंदिरों को करवाया ध्वस्त
इतिहासकार इब्राहीम एराली ने अपनी किताब ‘एम्परर्स ऑफ द पीकॉक थ्रोन: द सागा ऑफ द ग्रेट मुगल्स’ में बताया है कि कैसे औरंगजेब के शासनकाल में उज्जैन के आसपास के सभी मंदिरों को नष्ट कर दिया गया और राजस्थान में 300 मंदिरों को नष्ट किया गया, इस किताब में औरंगजेब द्वारा ध्वस्त किए गए कई मंदिरों के उदाहरण मिलते हैं. सितंबर 1667 में, औरंगजेब ने दिल्ली में कालका मंदिर के विध्वंस के लिए एक ‘फरमान’ जारी किया था. इस फरमान में मंदिर को तोड़ने का कारण ये बताया गया था कि मंदिर में बड़ी संख्या में हिंदू जमा हुए थे. औरंगजेब के लिए यह पर्याप्त कारण था कि वह अपनी सेना को मंदिर को गिराने का आदेश दे.  इस्लामिक इतिहास और सभ्यता का अध्ययन करने वाले डेविड अयालोन ने इस बात का वर्णन किया गया है कि कैसे औरंगजेब ने हिंदुओं को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया और हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया. 
धर्म के लिए लड़ने को रहते हैं तैयार
नागा साधु मूल रूप से तपस्वियों के एक समूह से संबंधित हैं जिन्होंने भौतिकवादी दुनिया को त्याग दिया है. इन्होंने मोक्ष प्राप्त करने के लिए जन्म और मृत्यु के चक्र से बचने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया है. इन संतों की अनूठी विशेषताओं में यह तथ्य शामिल है कि वे कड़ाके की ठंड में भी नग्न रहते हैं. वे अपने शरीर पर राख की एक परत लगाते हैं, सिर पर जटाओं की मोटी लटें पहनते हैं, त्रिशूल या कोई हथियार रखते हैं और चिलम या ‘शिव मुली’ नामक पाइप के माध्यम से मारिजुआना पीते हैं. वे भगवान शिव से इस तरह का जीवन जीने की प्रेरणा लेते हैं. लेकिन इन शैव संतों का एक दूसरा पहलू भी है. वे स्वभाव से उग्रवादी होते हैं और धार्मिक योद्धाओं के रूप में हिंदू धर्म के लिए लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.
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