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विधानसभा चुनाव: आदिवासियों की जागरुकता बढ़ाएगी राजनीतिक दलों की चिंता

विधानसभा चुनाव: आदिवासियों की जागरुकता बढ़ाएगी राजनीतिक दलों की चिंता!

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छत्तीसगढ़ में आदिवासी जल-जंगल-जमीन के साथ ही आदिवासी नेतृत्व की उपेक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार की बात भी प्रमुखता से करने लगे हैं.

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आदिवासी बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़ में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. सत्ता की दशा व दिशा तय करने में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है. प्रदेश में 33 फीसदी आबादी वाले आदिवासियों को अपने पक्ष में साधने सभी राजनीतिक दल हर स्तर पर कवायद कर रहे हैं. 15 सालों से सत्ता पर काबिज भाजपा व विपक्ष में बैठी कांग्रेस ही नहीं बल्कि दूसरे राजनीतिक दल भी आदिवासी सीटों पर फोकस कर रहे हैं. हर दल खुद को आदिवासियों का हितैषी साबित करने में लगा हुआ है.

सांकेतिक फोटो.


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छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटों में से 29 आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा 51 सीटें सामान्य व 10 सीटें अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं. आदिवासी आरक्षित सीटों पर जीत के लिए सत्तारूढ़ भाजपा हर दांव खेल रही है. पिछले 15 साल में नक्सल प्रभावित आदिवासी इलाकों में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के दावों के साथ ही सरकार चुनावी साल में आदिवासी इलाकों में प्रेशर कुकर, स्मार्टफोन बांटकर आदिवासियों का दिल जीतना चाहती है. वहीं दूसरी ओर विपक्ष एस्ट्रोसिटी एक्ट, पेसा कानून, वन अधिकार कानून सहित अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरकर खुद को आदिवासियों का सबसे बड़ा चिंतक बताने की कोशिश कर रहा है.


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छत्तीसगढ़ में शुरू के दो विधानसभा चुनावों में भाजपा का साथ देकर आदिवासी खुद को सत्ता की चाबी साबित करने में कामयाब रहे. साल 2008 के चुनाव में आदिवासी वर्ग की कुल आरक्षित 29 में से 19 सीटों पर भाजपा व 10 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी. प्रतिशत के आधार पर लगभग यही स्थिति साल 2003 के चुनाव में भी थी, लेकिन साल 2013 विधानसभा चुनाव में ये समीकरण गलत साबित हो गया. क्योंकि 29 में से आदिवासी आरक्षित 18 सीटें हारकर भी भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हो गई.


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आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व कोंटा के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम कहते हैं कि राजनीतिक मामले में आदिवासी बंटे हुए हैं. अपनी मांगों को लेकर आगे आने वाले आदिवासी सरकार के खिलाफ हैं. आदिवासी क्षेत्र बचाने, पत्थलगड़ी सहित अन्य मांगों को लेकर आंदोलन लगातार हो रहे हैं. इसका नुकसान सत्ता पक्ष को होगा. लेकिन आदिवासी बाहुल्य इलाके विशेषकर बस्तर की बात करें तो यहां के आदिवासी किसी दल नहीं बल्कि स्थानीय नेता के कार्यों को लेकर प्रभावित रह​ते हैं. यहां का ट्रेंड है कि चाहे दल कोई भी हो, लेकिन विधायक के लिए एंटी इनकंबेंसी का माहौल रहता है. ऐसे में पार्टी की बजाय स्वच्छ छवि के नेताओं के पक्ष में आदिवासियों के वोट इस चुनाव में जा सकते हैं.


आदिवासियों को लेकर भाजपा व कांग्रेस के अपने दावे हैं.

कांग्रेस के एसटी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष व विधायक अमरजीत भगत का कहना है कि आदिवासी हितों के लिए काम करने में केन्द्र व राज्य की भाजपा सरकार फेल रही है. वन अधिकार कानून, वन अधिकार कानून हो या फिर संवैधानिक अधिकार की बात हर मामले में सरकार ने आदिवासियों को छला है.
अमरजीत कहते हैं कि ये बात स्वाभाविक है कि जहां कांग्रेस के विधायक हैं, उनमें कुछ स्थानों पर जनता उनसे नाराज होगी. वहां हम इस बात को समझाएंगे कि कांग्रेसी विधायकों ने पूरे दमखम के साथ सरकार तक उनकी बात पहुंचाई, लेकिन काम कराने में सरकार ही नाकाम रही. दूसरी ओर भाजपा के एसटी विंग के प्रदेशअध्यक्ष सिद्धनाथ पैकरा का दावा है कि सरकार ने आदिवासी हित में कई काम किए हैं. इसका लाभ इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिलेगा.


सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिक मामलों के जानकार गौतम वनोपाध्याय का कहना है कि पहले की अपेक्षा पिछले कुछ सालों में आदिवासियों में जागरुकता बढ़ी है. आदिवासी जल-जंगल-जमीन के साथ ही आदिवासी नेतृत्व की उपेक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार की बात भी प्रमुखता से करने लगे हैं. अपने मुद्दों को लेकर सड़क पर भी उतरने लगे हैं. छत्तीसगढ़ की बात करें तो पिछले एक साल में आदिवासी नेतृत्व को लेकर समाज आगे आया है और आदिवासी संगठन चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारने की बात भी कह रहे हैं. छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री का मुद्दा भी तेजी से उठा है.
गौतम वनोपाध्याय का कहना है कि अब आदिवासियों को सिर्फ लुभावने वादों से आकर्षित नहीं किया जा सकता. ऐसे में पिछले कुछ सालों में आदिवासियों के बीच बढ़ी जागरुकता राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय है.


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गौतम वनोपाध्याय मानते हैं कि आदिवासियों के संगठनों की सक्रियता के साथ ही जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ व आम आदमी पार्टी की आदिवासी इलाकों में सक्रियता इस बार के चुनाव में भाजपा व कांग्रेस की मुसीबतें बढ़ा सकती हैं. सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष बीपीएस नेताम का कहना है कि चुनाव से पहले संगठन ने साफ कर दिया है कि वे अपने बैनर से प्रत्याशी नहीं उतारेंगे, लेकिन यदि समाज का कोई चुनाव लड़ेगा तो उसे सीधा समर्थन करेंगे, चाहे वो किसी भी दल का हो.


आदिवासियों का दिल जीतने में लगी हैं पार्टियां


आदिवासी महिला रतनी बाई को पीएम नरेन्द्र मोदी ने पहनाई चप्पल. फाइल फोटो.


गौरतलब है कि इस चुनावी साल में कांग्रेस और भाजपा का पूरा फोकस ही आदिवासी सीटों पर है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद बस्तर का दो चक्कर लगा चुके हैं. पीएम मोदी इसी साल 14 अप्रैल को धुर नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले के छोटे से गांव जांगला पहुंचे और यहीं से आयुष्मान भारत योजना देश को समर्पित किया. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेंदूपत्ता संग्राहकों को चरणपादुका का वितरण के दौरान बुजुर्ग आदिवासी महिला रतनी बाई को खुद चप्पल पहनाकर आदिवासी वोटरों का दिल जीतने की कोशिश की. इसके अलावा प्रदेश की भाजपा सरकार ने अपने विकास यात्रा की शुरुआत नक्सल प्रभावित आदिवासी बाहुल्य बस्तर के दंतेवाड़ा से की. कांग्रेस भी पीछे नहीं है. राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने बस्तर में अपनी विशेष टीम उतारी है. तीसरे मोर्चा के रूप में सामने आई पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी की विजय रथ यात्रा भी आदिवासी क्षेत्रों से होकर गुजरेगी.


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-विधानसभा चुनाव: एंटी इनकंबेंसी से निपटने के लिए इस फार्मूले पर काम कर रही BJP

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