एक एक्सीडेंट ने खोली मौत की कहानी, CBI ने ऐसे पकड़ा वो शातिर जिसने की थी पूर्व आर्मी चीफ की हत्या
10 अगस्त 1986 को भारत के पूर्व आर्मी चीफ अरुण श्रीधर वैद्य की हत्या कर दी गई थी. जनरल वैद्य 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के कमांडर थे. इस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी. सीबीआई के लिए यह मामला सुलझाना तब आसान हुआ, जब एक साधारण सड़क दुर्घटना में पुलिस के हाथ एक हथियार लग गया, जिससे हत्या की कड़ियां जुड़ती चली गईं.
नई दिल्ली. 10 अगस्त 1986 को पुणे के अत्यधिक सुरक्षित इलाके में भारत के पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल अरुण श्रीधर वैद्य को मोटरसाइकिल पर आए हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. जनरल वैद्य 1983 से 1986 तक भारत के सेना प्रमुख रहे और 1984 में स्वर्ण मंदिर (श्री हरमंदिर साहिब) पर हुए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का नेतृत्व उन्हीं ने किया था. उनकी हत्या को इसी ऑपरेशन का बदला माना गया. यह मामला सीबीआई (CBI) को सौंपा गया, जिसके लिए जांच एक बड़े चैलेंज से कम नहीं थी.
सीबीआई की शुरुआती जांच में को कोई ठोस सुराग नहीं मिल रहा था. हमलावरों ने हत्या को इतनी सफाई से अंजाम दिया था कि पुणे पुलिस के लिए कड़ियां जोड़ना मुश्किल हो गया. जांच को दिल्ली में सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया गया, जहां इसे उच्चतम प्राथमिकता वाले मामलों में रखा गया.
पूर्व आर्मी चीफ की हत्या का राज
जनरल वैद्य हत्याकांड की पूरी जांच में टर्निंग पॉइंट तब आया, जब 7 सितंबर 1986 को पुणे के पिंपरी-चिंचवड़ में एक अविश्वसनीय दुर्घटना घटी. इस घटना में मोटरसाइकिल पर सवाल दो शख्स एक ट्रक से टकरा गए. जब लोगों ने उनकी मदद करने की कोशिश की तो उन्होंने भीड़ पर गोली चलाने की धमकी देकर वहां से फरार हो गए. लेकिन एक इंसपेक्टर एआई पठान ने दोनों का पीछा किया और दोनों को पकड़ लिया. जब दोनों को जीप से लाया जा रहा था दोनों ने खालिस्तानी जिंदाबाद के नारे लगाए.
7 सितंबर 1986 को पुणे के पिंपरी-चिंचवड़ में एक अविश्वसनीय दुर्घटना घटी.
कैसे सीबीआई का लगा बड़ा सुराग?
पुलिस जांच में दोनों स्वीकार किया कि उन्होंने जनरल वैद्य की हत्या की. मोटरसाइकिल में हथियार की बरामदगी जांच के दौरान, दुर्घटनाग्रस्त मोटरसाइकिल के पास से एक हथियार बरामद हुआ. इस हथियार को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया. फॉरेंसिक रिपोर्ट ने पुष्टि की कि बरामद हुई पिस्तौल और जनरल वैद्य को मारने के लिए इस्तेमाल की गई बंदूक की बैलिस्टिक प्रकृति एक समान थी. यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण भौतिक प्रमाण था जो हत्यारों तक पहुंचने में मददगार साबित हुआ.
हत्या का खालिस्तानी कनेक्शन?
हथियार से जुड़े सुराग के आधार पर सीबीआई ने सफलतापूर्वक हत्यारों की पहचान की. यह अपराध खालिस्तानी आतंकवादी समूह ‘खालिस्तान लिबरेशन आर्मी’ के दो सदस्यों ने किया था, जिसका नाम सुखदेव सिंह ‘सुखा’ और हरजिंदर सिंह ‘जिंदा’ के रूप में हुई. इन दोनों को 1987 में गिरफ्तार किया गया. सीबीआई ने कोर्ट में मजबूत मामला पेश किया, जिसमें यह साबित हुआ कि जनरल वैद्य की हत्या ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला थी. पुणे की एक अदालत ने दोनों दोषियों को 21 अक्टूबर 1989 को मौत की सजा सुनाई. उन्हें 9 अक्टूबर 1992 को पुणे की यर्वदा सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई.
हत्या के वक्त साथ में कौन-कौन था?
बता दें कि 10 अगस्त 1986 की सुबह जनरल वैद्य अपनी पत्नी और गार्ड के साथ खरीदारी करने गए थे. वैद्य खुद गाड़ी चला रहे थे, जबकि पत्नी और गार्ड गाड़ी में बैठे थे. रास्ते में गाड़ी जब धीमी हुई तो मोटरसाइकिल सवार दो शख्स में से पीछे बैठा शख्स ने वैद्य को गोली मार दी. इस हमले में वैद्य की पत्नी को भी गोली लगी. जबकि वैद्य की गाड़ी पलट गई.
वैद्य और पत्नी को पूणे के कमांड अस्पताल में ले जाया गया, जहां पर वैद्य को मृत घोषित कर दिया गया. इस मामले में सीबीआई की सफलता यह दर्शाती है कि कैसे एक साधारण दुर्घटना के सुराग ने एक हाई-प्रोफाइल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील हत्याकांड को सुलझाने में मदद की. जनरल वैद्य को 1965 और 1971 के युद्धों के लिए दो बार महावीर चक्र मिला था.
