JNU में विवेकानंद की प्रतिमा को लेकर क्यों मचता रहा है बवाल?
जेएनयू कैंपस में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति (Vivekananda statue at Jawaharlal Nehru University) को लेकर छात्र लगातार अपनी नाखुशी खुले या छिपे तौर पर दिखाते रहे. साल 2019 में उस कपड़े पर अपशब्द लिखे मिले, जिससे मूर्ति ढंकी हुई थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(JNU) में गुरुवार को स्वामी विवेकानंद की मूर्ति का अनावरण किया. विवेकानंद की ये आदमकद प्रतिमा लगभग तीन सालों से ढंकी हुई रखी थी. मूर्ति के तैयार होने से लेकर उसके अनावरण तक ये लगातार विवादों में रही. आमतौर पर विवेकानंद को दक्षिणपंथियों के साथ वामपंथी भी महान शख्सियत मानते हैं तो फिर आखिर क्या वजह है जो लेफ्ट के गढ़ में उनकी मूर्ति पर लगातार बवाल हो रहा है. यहां समझिए.
दरअसल मूर्ति को लेकर विवाद उसके बनने की तैयारी के साथ शुरू हो गया. साल 2017 में प्रतिमा निर्माण का काम शुरू हुआ. तब खुद यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव काउंसिल (EC) ने इस बात की पहल की थी. उसका कहना था कि कैंपस में विवेकानंद जैसी महान शख्सियत की मूर्ति लगाना ठीक है क्योंकि उन्होंने देश के निर्माण में योगदान दिया था. ये भी तय हुआ कि आदमकद प्रतिमा के चारों ओर पक्का निर्माण हो, पत्थर के बने पाथ-वे हों. साथ में बैठने और रोशनी की व्यवस्था भी हो.
स्वामी विवेकानंद की मूर्ति को लेकर जेएनयू कैंपस में लगातार सवाल होते रहे
इसपर जेएनयू के छात्रों ने सवाल किया कि मूर्ति बनवाने के पैसे कहां से आए. उनका ये भी आरोप था कि शायद ये पैसे लाइब्रेरी या किसी दूसरे फंड से काटे गए हैं. हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस बात से इनकार करते हुए कहा कि फंड पूर्व छात्रों से मिला था. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में इस बात का हवाला मिलता है कि प्रतिमा का विचार जेएनयू के ही इंजीनियरिंग विभाग से आया था.
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इस बारे में RTI भी डाली गई कि इसे फंड किसने किया. जवाब में यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इतना ही बताया कि यूनिवर्सिटी की किसी फंड का इस्तेमाल इसमें नहीं हुआ है. बवाल को हवा साल 2019 में मिली, जब मूर्ति के आसपास अपशब्द लिखे मिले. खुद जेएनयू प्रशासन ने इसकी शिकायत दर्ज कराई. यहां तक कि मूर्ति को ढंके हुए केसरिया रंग के कपड़े पर भी अपशब्द लिखे मिले, जो कथित तौर पर एक पार्टी विशेष के बारे में थे. यहां तक कि स्वामी विवेकानंद तक को एक पार्टी की विचारधारा से जोड़ दिया गया.
पिछले साल ढंकी हुई मूर्ति के आसपास अपशब्द लिखे मिले
तहकीकात शुरू होने पर जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन ने आरोप लगाया कि ये काम छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) का रहा होगा ताकि लोगों का ध्यान भटके. बता दें कि उसी साल यूनिवर्सिटी में फीस बढ़ाने के विरोध में छात्रों ने बड़ा आंदोलन किया था. स्टूडेंट्स यूनियन के मुताबिक मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए ABVP ने ऐसा कर दिया होगा. हालांकि असल बात सामने नहीं आ सकी कि आखिर मूर्ति के आसपास अनापशनाप लिखना किसकी साजिश थी.
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जेएनयू के स्टूडेंट यूनियन का ये भी मानना है कि वहां विचारधारा की आजादी को बांधकर एक अलग दिशा में ले जाने के लिए लगातार कोशिश हो रही है. यहां तक कि विवेकानंद की प्रतिमा भी इसी दिशा में एक कोशिश है. यहां ये याद करें कि साल 2016 में जेएनयू कैंपस के भीतर कई देशविरोधी आवाजों का आरोप लगा था. उसी साल जेएनयू में आतंकी अफजल गुरु को फांसी के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन भी किया था.
साल 2016 में जेएनयू कैंपस के भीतर कई देशविरोधी आवाजों का आरोप लगा
इसके तुरंत बाद प्रशासन ने कैंपस के भीतर एक मिलिट्री टैंक बनाने की बात की थी. इसके बाद ही कैंपस के भीतर एक सड़क का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर के नाम पर कर दिया गया. सावरकर का नाम अक्सर ही हिंदुत्व विचारधारा के लिए आता रहता है. ये देखते हुए छात्रों ने मान लिया कि उनकी विचारधारा को रोकने के लिए ये तरीके आजमाए जा रहे हैं.
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फिलहाल लगभग तीन सालों बाद मूर्ति के अनावरण और पीएम मोदी के वर्चुअल संबोधन को कई तरह से देखा जा रहा है. इसमें ये गणित भी लगाया जा रहा है कि शायद ये जेएनयू की वाम विचारधारा को संतुलित करने की कोशिश है. वैसे यहां ये समझना जरूरी है कि पीएम जिस पार्टी यानी बीजेपी से हैं, उसमें स्वामी विवेकानंद को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी विवेकानंद के विचारों से प्रेरित माना जाता है. ऐसे में ये भी हो सकता है कि विवेकानंद की प्रतिमा वाम गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश हो.
