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Explainer: फैक्ट्रियों के धुएं के कारण उनके पास अधिक गिरती है बर्फ!

Explainer: फैक्ट्रियों के धुएं के कारण उनके पास अधिक गिरती है बर्फ, प्रदूषण-बर्फबारी का है गहरा नाता

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एक स्टडी में दावा किया है कि तमाम फैक्ट्रियों से निकले धुएं के साथ निकला एरोसॉल बादलों को जमा कर बर्फबारी का कारण बन सकता है. सैटेलाइट से किए अवलोकनों के आधार पर शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उद्योगों के प्रदूषण और स्थानीय बर्फबारी में गहरा संबंध है. यह कई समस्याओं को जन्म भी दे सकता है.

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दिल्ली में इन दिनों हवा की हालत बहुत अधिक खराब है. कारण साफ है- प्रदूषण , जो सर्दी के मौसम में खास तौर से तकलीफ देने वाला होता है. फॉग के साथ मिल कर प्रदूषित हवा बहुत ज्यादा बुरा असर देती है जिससे विजिबिलिटी सबसे अधिक खराब हो जाती है. ऐसे में अगर बारिश हो जाए तो दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में हवा में कुछ सफाई देखने को मिल सकती है. पर क्या ऐसा हो सकता है कि कहीं प्रदूषण से निकलने वाली हवा के कारण बर्फबारी जैसी घटना हो गई हो. एक स्टडी में यह रोचक नतीजा देखने को मिला है जिसमें वैज्ञानिकों ने समझाया है कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसके पीछे मौसम कैसे और कितना जिम्मेदार है?

देखने में आता है कि फैक्ट्री वाले इलाकों और उसके आसपास ज्यादा बर्फबारी होती है, इसी की वजह पता चली है. प्रतीकात्मक तस्वीर Canva

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एक खास तरह की घटना इसके लिए जिम्मेदार
जी हां, दुनिया में जहां कहीं भी बर्फ बारी होती है, वहां फैक्ट्री के पास बर्फ बारी ज्यादा होती है. स्टडी में वैज्ञानिकों ने इसी का कारण बताया है. कई सस्थानों के शोधकर्ताओं की एक टीम के किए गए अध्ययन में प्रस्ताव दिया गया है कि कारखानों और कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों जैसे औद्योगिक स्थलों द्वारा निकले प्रदूषण के छोटे कण -10 डिग्री सेल्सियस और -24 डिग्री सेल्सियस (14 और -11 डिग्री फ़ारेनहाइट) के बीच के तापमान पर क्लाउड ग्लेशिएशन जैसी घटना को शुरू कर सकते हैं.

बादल की बूंदों से बनते हैं बर्फीले क्रिस्टल
यह प्रक्रिया बादलों में पानी की बहुत ही अधिक ठंडी बूंदों को बर्फ के क्रिस्टल में बदल देती है. शोधकर्ताओं के अनुसार, एरोसोलयुक्त प्रदूषक बर्फ के क्रिस्टल बनाने के लिए केंद्र या नाभिक के रूप में कार्य करके इस प्रक्रिया को शुरू कर सकते हैं. उद्योग के निकला जल वाष्प और गर्मी भी कुछ प्रकार की भूमिका निभा सकती है.

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बादलों में पानी की बूंदों का बर्फ के क्रिस्टल में बदला इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

हर जगह नहीं बन रहे थे बर्फ के बादल
टीम नासा के टेरा रिसर्च सैटेलाइट पर एक सेंसर उपकरण मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर (MODIS) की ली गई नियर इंफ्रारेड सैटेलाइट इमेजरी पर गहराई से नज़र डालकर इस नतीजे पर पहुंची. इसमें, उन्होंने पाया कि 67 औद्योगिक स्थलों से एरोसोल उत्सर्जित करने वाले बादलों में कुछ असामान्य हो रहा था. वहां ना केवल बादलों की मात्रा कम हुई, बल्कि तरल बादल भी कम थे. इसके बजाय, उनकी कीमत पर बर्फ के बादल बन रहे थे.

उद्योगों के आसपास हुई अधिक बारिश
बारिश के आंकड़ों पर गौर करने पर टीम ने पाया कि इसका नतीजा यह हुआ कि औद्योगिक स्थलों के आसपास के क्षेत्रों में अधिक बर्फबारी हुई. शोधकर्ताओं ने नतीजों के बारे में बताते हुए शोधपत्र में लिखा, “ग्लेशियर-प्रेरित बर्फबारी ने अध्ययन किए गए औद्योगिक एरोसोल स्रोतों के करीब वर्षा की मात्रा को बहुत प्रभावित किया.” “ग्लेसिएशयन के कारण दैनिक बर्फबारी 15 मिमी तक पहुंच गई, जबकि बर्फबारी की तीव्रता औसतन 1.2 मिमी/घंटा थी.”

उद्योगों के आसपास बर्फबारी ज्यादा होना समस्या बढ़ा सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Canva)

इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह संभावित रूप से एक महत्वपूर्ण समस्या है. अध्ययन के सह-लेखकों में से एक प्रोफेसर निकोलस बेलौइन ने एक बयान में बताया, “हम पहले से ही वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में जानते थे, लेकिन अब हम जानते हैं कि कारखानों का धुआं बारिश के बादलों को बर्फ के बादलों में बदल सकता है. इससे अप्रत्याशित बर्फबारी हो सकती है जो अन्य इलाकों में नहीं होती है.”

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लोगों को रहना होगा तैयार
“एक भी घटना एक शहर से बड़े क्षेत्र में आधे इंच से अधिक बर्फ गिरा सकती है. इसका मतलब है कि कारखानों के नीचे की ओर रहने वाले समुदायों को अचानक बर्फबारी के लिए बेहतर तरीके से तैयार रहना पड़ सकता है, खासकर सर्दियों में. बादलों के इस ग्लेसिएशन का ग्रह की जलवायु पर व्यापक प्रभाव भी पड़ सकता है.

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बादल सूर्य के प्रकाश को वापस अंतरिक्ष में टकरा कर वापस  लौटाने में भूमिका निभाते हैं. जब टीम ने दो अलग-अलग बादलों के प्रकारों में इस परावर्तन के स्तर की तुलना की, तो उन्होंने पाया कि बर्फ के बादल तरल बादलों की तुलना में 14 प्रतिशत कम सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं. हालांकि, अध्ययन के लेखक चेतावनी देते हैं कि बादलों के ग्लेसिएशन में एरोसोल की भूमिका और जलवायु के लिए संभावित परिणामों को पूरी तरह से समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है. यह अध्ययन साइंस में प्रकाशित हुआ है.

About the Author

Vikas Sharma
As an exclusive digital content Creator, specifically work in the area of Science and technology, with special interest in International affairs. A civil engineer by education, with vast experience of training in computer networking and teaching mathematics. Has written an inspirational book on mathematics for school students.
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