थाईलैंड के राजाओं को राम ही क्यों कहा जाता है, इस बौद्ध देश का राष्ट्रीय ग्रंथ क्या है?
थाईलैंड का मौजूदा चक्री राजवंश खुद को राम कहता रहा है. ये वही राम हैं, जो विष्णु के अवतार भगवान राम के रूप में सनातन धर्म के अनुयायियों के आराध्य हैं. सवाल उठता है कि यह राजवंश अपने नाम में राम का इस्तेमाल आखिर क्यों करता है? इसका भगवान राम से क्या नाता है? बता दें कि चक्री वंश के वर्तमान राजा को राम 'दशम' कहा जाता है.
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होनी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मौके पर अयोध्या पहुंचेंगे. भारत में कुछ लोग श्रीराम को भगवान राम तो कुछ राजा राम के तौर पर पूजते हैं. अयोध्या में रामलला का विशाल मंदिर बनकर तैयार है. लेकिन, क्या आप जानते हैं थाईलैंड के राजाओं को भी राम कहा जाता है. भारत की अयोध्या की तरह थाईलैंड में अयुत्या है, जिसके आसपास ब्रह्मा, विष्णु और महेश के मंदिर हैं.
थाईलैंड का मौजूदा चक्री राजवंश खुद को राम कहता रहा है. ये वही राम हैं, जो विष्णु के अवतार भगवान राम के रूप में सनातन धर्म के अनुयायियों के आराध्य हैं. सवाल उठता है कि यह राजवंश अपने नाम में ‘राम’ का इस्तेमाल क्यों करता है? इसका भगवान राम से क्या नाता है? बता दें कि चक्री वंश के मौजूदा राजा को राम ‘दशम’ कहा जाता है.
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कब शुरू हुआ राम की उपाधि जोड़ना?
चक्री वंश के राजा राम की उपाधि अपने नाम के साथ इस्तेमाल करते रहे हैं. हालांकि, राम दशम से साफ है कि दस पीढ़ी पहले चक्री वंश के राजा अपने नाम में राम की उपाधि नहीं लगाते थे. माना जाता है कि उपाधि में राम के साथ अंक जोड़ने के पीछे यूरोप की संस्कृति का असर रहा है. इस वंश के छठे राजा वजिरावुध ने इंग्लैंड में पढ़ाई की. इस दौरान उन्होंने ब्रिटेन के शासकों के नाम में पंचम, द्वितीय पढ़े. इसी के बाद उन्हें राम के साथ अंक जोड़ने का विचार आया. बताया जाता है कि वजिरावुध ने सबसे पहले खुद को राम ‘सिक्स्थ’ कहा था. इसी के बाद चक्री वंश के राजाओं के नाम में राम की उपाधि के साथ अंक जोड़ने का चलन शुरू हो गया.
थाईलैंड के राम मंदिर की प्रतीकात्मक तस्वीर.
कैसे शुरू हुआ उपाधि में संख्या जोड़ना
थाई परंपरा में आम लोग अपने राजा का नाम नहीं लेते थे. इसीलिए चक्री वंश के पहले राजा पुत्थयोत्फा चालुलोक ने अपने नाम के साथ उपाधि के तौर पर फान दिन तोन जोड़ा था. ये एक थाई शब्द है, जिसका मतलब ‘आदि शासक’ होता है. अब इस उपाधि की अपनी समस्याएं भी थीं. दरअसल, इस उपाधि को जारी रखने पर दूसरे राजा की उपाधि ‘मध्यम’ और तीसरे शासक की उपाधि ‘अंतिम शासक’ हो जाती. इस समस्या के समाधान के लिए भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं के आधार पर उपाधि दी जाने लगी. बात यहीं खत्म नहीं हुई और राजसी नामावली को व्यवस्थित करने के लिए कई प्रयोग किए गए. इतिहासकारों ने राजा नांग क्लाओ को रत्चकन थी सैम यानी ‘शासक तृतीय’ कहा. इसके बाद यह प्रयोग चल पड़ा.
राम दशम दुनिया के सबसे अमीर राजा
राजा वजिरावुध ने खुद को अंग्रेजी में ‘राम सिक्स्थ’ कहा. इसे रत्चकन के प्रयोग से जोड़ा गया, लेकिन यह ‘हिंदी अंग्रेजी’ से मिलकर बनी उपाधि थाई राजाओं के लिए परंपरा बन गई. वर्तमान में थाईलैंड के राजा की उपाधि ‘राम दशम’ है. राम दशम थाईलैंड में ‘फुटबॉल प्रिंस’ के नाम से मशहूर हैं. वह साइकिलिंग से जुड़े बड़े-बड़े आयोजनों के लिए भी पहचाने जाते हैं. राम नवम यानी भूमिबोल अदुल्यादेज के निधन के बाद महा वजिरालोंगकोर्न यानी राम दशम साल 2016 से थाईलैंड के राजा हैं. उनका राज्याभिषेक 2019 में हुआ था. साल 2020 में उनकी संपत्ति 43 अरब डॉलर आंकी गई थी. उन्हें दुनिया के सबसे अमीर शासक के तौर पर माना गया.
थाई रामायण का एक चित्र. (Image: Wikipedia)
थाईलैंड में भी है राजा राम की अयोध्या
थाईलैंड के शहर अयुत्या को ही अयोध्या माना जाता है. वहीं, अयुत्या के राजाओं को रामातिबोधि यानी अधिपति राम की उपाधि दी जाती रही है. वाल्मीकि रामायण में भगवान राम की राजधानी के तौर पर अयोध्या का जिक्र है. थाईलैंड में अयुत्थया को रामायण की अयोध्या माना जाता है. अयुत्या 1351 ईसवी से स्याम राजवंश के शासकों की राजधानी रही है. बता दें कि थाई अयोध्या के अवशेषों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में जगह दी गई है.
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बौद्ध देश थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ क्या है
भगवान बुद्ध के देश थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ रामकीन है. इसे थाई रामायण का दर्जा हासिल है. ‘300 रामायण’ ग्रंथ के लेखक रामानुजन रामकीन की तुलना वाल्मीकि रामायण से करते है. मान्यता है कि 18वीं सदी में रामकीन को राजा राम प्रथम ने नए सिरे से लिखवाया था. रामकीन में मुख्य खलनायक थोत्सकान वाल्मीकि रामायण के रावण जैसा है. रामकीन के नायक फ्रा राम में राम के आदर्श दिखते हैं. भारत के राम जन्मभूमि निर्माण न्यास ने 2018 में अयुत्या में एक राम मंदिर निर्माण शुरू कराया.
