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कभी ठीक करते थे साइकिल का पंक्चर आज हैं IAS ऑफिसर, पढ़िए उनके संघर्ष की कहानी

कभी ठीक करते थे साइकिल का पंक्चर आज हैं IAS ऑफिसर, पढ़िए उनके संघर्ष की कहानी

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वरुण ने कॉलेज में एडमिशन तो ले लिया लेकिन आगे की राह भी वरुण के लिए आसान नहीं थी. कॉलेज की हर महीने की फीस 650 रुपए थे जो उनके परिवार के लिए खर्च करना बहुत मुश्किल था. लेकिन वरुण ने हार नहीं मानी.

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अगर हौसला हो तो इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता. अपनी मेहनत के बल पर आप कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत रखते हैं. अपनी गरीबी और असफलताओं को पीछे छोड़कर आप मेहनत के दम पर अपने सपनों को साकार कर सकते हैं. ऐसी ही कुछ कहानी<br />वरुण बरनवाल की है. काफी छोटी उम्र में वरुण ने अपने पिता को खो दिया. घर की स्थिति अच्छी नहीं थी तो उन्होंने बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला लिया. लेकिन कहते हैं न जहां चाह वहां राह. उनके आसपास रहने वाले ही कुछ लोगों ने उनकी मदद की जिसकी वजह से आज वह एक आईएएस ऑफिसर हैं.
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वरुण महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर बोइसार के रहने वाले हैं. बचपन में वह डॉक्टर बनने का सपना देखा करते थे. उनके पिता साइकिल की पंक्चर बनाने का एक छोटा सा दुकान चलाते थे. लेकिन वरुण और उनकी बहन को अच्छी जिंदगी देने के लिए वह कड़ी<br />मेहनत करते थे. पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. मार्च 2006 में वरुण के पिता की हार्टअटैक से मौत हो गई. उस समय वरुण ने दसवीं बोर्ड की परीक्षा दी थी. हॉस्पिटल की बिल ने परिवार को दाने-दाने का मोहताज बना दिया. वरुण की बड़ी बहन<br />टीचर थी. मगर उसकी पगार घर चलाने और लोन चुकाने के लिए काफी नहीं था. इसलिए वरुण ने पढ़ाई बीच में छोड़ने का काफी कठिन फैसला ले लिया और अपने पिता की साइकिल की दुकान चलाने लगे.
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उन्होंने खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया. लेकिन 10वीं के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे. वरुण को बोर्ड की परीक्षा में अपने शहर में दूसरी रैंक हासिल हुई थी. उनकी इस सफलता से उनके दोस्त और टीचर्स काफी खुश हुए. उनके एक दोस्त ने पूछा कि इतने<br />अच्छे नंबरों के बाद उन्होंने आगे क्या करने का सोचा है. दोस्त की इस बात से वरुण काफी दुखी हो गए. मां ने उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए समझाया. फैसला हुआ कि मां दुकान चलाएगी. इसके बाद वरुण पास के कॉलेज का एडमिशन फॉर्म लेकर आए. लेकिन<br />एडमिशन फीस 10,000 रुपए थी. वरुण ने फिर से पढ़ाई छोड़ने का फैसला ले लिया. और दोबारा दुकान चलाने में लग गए.
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एक दिन पिता का इलाज करने वाले डॉ कंपली से वरुण की मुलाकात हुई. डॉक्टर कंपली से वरुण से उनके भविष्य की य़ोजनाओं के बारे में पूछा. वरुण ने उन्हें बताया कि आर्थिक तंगी की वजह से उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है. डॉ कंपली ने तुरंत अपनी जेब से<br />10 हजार रुपए निकालकर वरुण को दिया और उनसे तुरंत एडमिशन लेने के लिए कहा.
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वरुण ने कॉलेज में एडमिशन तो ले लिया लेकिन आगे की राह भी वरुण के लिए आसान नहीं थी. कॉलेज की हर महीने की फीस 650 रुपए थे जो उनके परिवार के लिए खर्च करना बहुत मुश्किल था. लेकिन वरुण ने हार नहीं मानी. वरुण रोज सुबह उठ जाते,<br />कॉलेज जाकर पढ़ाई करते. इसके बाद दोपहर में वो ट्यूशन पढ़ाते थे. और शाम को दुकान का हिसाब-किताब करने में मां की मदद करते थे. इसके बाद वो रात में पढ़ाई करते थे.
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लेकिन अभी भी हर महीने कॉलेज की फीस भरने में उन्हें काफी दिक्कत होती थी. लेकिन जब उनके टीचर्स को उनकी इस परेशानी के बारे में पता चला तो उन्होंने अपनी जेब से उनकी फीस भरी. 12वीं के बाद उनके सपने के पूरा होने का समय आ गया. उन्हें<br />मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया लेकिन यहां भी उनके लिए सबसे बड़ी समस्या पैसों की थी. उन्होंने इंजीनियरिंग में एडमिशन लेने की सोची. परिवार ने वरुण के फर्स्ट इयर का फीस भरने के लिए सारी जमा पूंजी लगा दी यहां तक की पुरखों की जमीन भी बेचनी पड़ी.
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एमआईटी कॉलेज पुणे में वरुण ने फर्स्ट सेमेस्टर टॉप किया. अब वह स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई कर सकते थे. लेकिन एप्लीकेशन से लेकर अप्रूवल प्रक्रिया काफी पेंचीदा थी. इसी जद्दोजहद में उनका सेकेंड सेमेस्टर भी निकल गया. हालांकि स्कॉलरशिप से थर्ड<br />और फाइनल ईयर की फीस उन्होंने भरी. साल 2012 में उन्हें Deloitte नाम की मल्टीनेशनल कंपनी से जॉब का ऑफर आया.
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लेकिन अभी भी उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. उन्होंने अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल और एंटी करप्शन फाइट में हिस्सा लिया. अब केवल परिवार की समस्या को दूर करना ही उनका उद्देश्य नहीं रह गया था बल्कि सिविल सेवा में जाकर वह समाज के लिए भी कुछ करना चाहते थे.
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जून 2012 में उनके रूममेट ने उन्हें एक कोचिंग इंस्टीट्यूट से रूबरू करवाया जहां वह फैकल्टी के रूप में काम कर सकते थे और साथ ही पढ़ाई भी कर सकते थे. लेकिन पढ़ाई के लिए किताबें खरीदने में उन्हें दिक्कत का सामना करना पड़ा. इस समय उनकी मदद<br />ऐसे शख्स ने की जहां से उन्होंने मदद की उम्मीद नहीं की थी. ट्रेन में सफर के दौरान उनकी मुलाकात एक शख्स से हुई. वह होप नाम के एनजीओ से जुड़ा था. वरुण की दिक्कतों के बारे में पता चलने पर उसने अपने एनजीओ से वरुण की किताबें खरीदने में मदद की.
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साल 2014 वरुण के लिए काफी लकी साल रहा. यूपीएससी की परीक्षा उन्होंने क्लीयर कर ली थी. इतना ही नहीं देशभर में उनका 32वां रैंक था. वरुण फिलहाल गुजरात के हिम्मतनगर में असिस्टेंट कलेक्टर के पद पर पोस्टेड हैं. आज उनकी जिंदगी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है. (सभी तस्वीरें वरुण बरनवाल के फेसबुक अकाउंट से साभार)
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