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पर्वतों पर कहर ढाएगी जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली चरम बारिश!

पर्वतों पर कहर ढाएगी जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली चरम बारिश!

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जलवायु परिवर्तन पर नए तरह के शोध में पाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग पर्वतमालाओं में बर्फबारी को भारी बारिश में बदल रही है. ऐसा अभी ही नहीं बल्कि कई दशकों पहले से हो रहा है जिसका असर दुनिया की कम से कम एक चौथाई आबादी पर देखने को मिलेगा. शोध में खुलासा हुआ है कि हर एक डिग्री तापमान बढ़ने से पर्वतों पर 15 फीसद बर्फबारी चरम बारिश में बदल रही है.

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सामान्य परिस्थितियों में होता यह है कि महासागरों से पानी उड़ कर बादलों के रूप में पर्वतों में बर्फबारी के जरिए लंबे समय तक जम जाता है और धीरे धीरे गर्मी के दिनों में पिघल कर नदियों में बहता रहता है. नए अध्ययन में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन उत्तरी गोलार्द्ध में पर्वतों में बर्फबारी बारिश में बदल रहा है. यानि अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फबारी की जगह चरम बारिश लेने लगी है और जो कि आने वाले समय में पर्वतों पर कहर बन कर टूटने वाली है. और दुनिया को इसकी वजह से भूस्खलन, भीषण बाढ़, बढ़ता मृदा अपरदन, जैसे बहुत सारे गंभीर नतीजे देखने को मिलेंगे.
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बर्केले लैबोरेटरी के ऊर्जा विभाग के शोधकर्ता अपनी पड़ताल के नतीजे नेचर में प्रकाशित हुए हैं अध्ययन के प्रमुख लेखक मोहम्मद ओम्बादी का कहना है कि दुनिया की एक चौथाई आबादी पर्वतों और पहाड़ों के अनुप्रवाह यानि प्रवाह के निचले हिस्से की ओर के इलाकों में रहती है. इस जोखिम का उन पर सीधा असर पड़ेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
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जहां विशेषज्ञों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन की चरम घटनाओं की वजह से पानी की मात्रा में बहुत ज्यादा इजाफा करेंगे.यह पहला अध्ययन है जिसमें शोधकर्ताओं ने निर्धारित करने का प्रयास किया है कि यह पानी बर्फ के पिघलने वाला होगा कि सीधी बारिश का होगा. उन्होंने पाया है कि पर्वतमालाओं में अब बर्फबारी की जगह चरम बारिश लेने लगी है. जिससे जोखिम बढ़ गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
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शोधकर्ताओं ने पाया कि वैश्विक तापमान में हर एक डिग्री सेल्सिलस के इजाफे से ऊंचे इलाकों में बारिश में औसतन 15 फीसद इजाफा हो जाता है. इस चरम बारिश को हम कुछ समय पहले से ही देखने लेगे हैं. यह दर 1950 से लेकर 2019 तक एक सी ही रही है और आगे भी यही 15 फीसद की रहेगी. ऐसा उत्तरी गोलार्द्ध के उत्तरी अमेरिकी प्रशांत पर्वत शृंखला से लेकर हिमालय और ऊंचाई वाले इलाकों में देखने को मिलेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
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ऐसा उन पर्वतमालाओं में ज्यादा देखने को मिलेगा जहां बर्फबारी शून्य से जरा से कम तापमान पर हो जाती है. ऐसे में तापमान में जरा सा बदलाव बर्फबारी को बारिश में बदल देगा. जबकि जहां ज्यादा कम तापमान पर बर्फबारी होती है वहां अभी ऐसा नहीं होगा. शोधकर्ता आशा करते हैं कि वैज्ञानिक अपने जलवायु प्रतिमानों में बर्फबारी और बारिश को अलग अलग रूप में शामिल करने के लिए संवेनशील होंगे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
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ऐसे मे अब अनुप्रवाह के इलाकों मे हालात से निपटने के लिए नियोजन शुरू कर देना चाहिए. इससे पर्वतीय इलाकों के बुनियादी ढांचे के नियोजन पर भी ज्यादा देने की जरूरत होगी. जिससे इनके दुष्प्रभावों से निपटा जा सके. जहां दुनिया ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने प्रयास कर रही है, इस शोध का एक डिग्री इजाफे से 15 फीसद बारिश में इजाफे का सीधा संबंध बहुत ज्यादा मायने रखता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
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यानि अगर तीन डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ता है तो चरम बारिश में सीधी 45 फीसदी बढ़ोत्तरी देखने को मिलेगी. ऐसे में शोध साफ तौर पर इशारा करता है कि हमें स्वच्छ तकनीकों में ज्यादा निवेश की और वार्मिंग के नतीजों से निपटने की तैयारी करने भी जरूरत है. क्यों अब हमारे पास ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के अन्य प्रभावों को कम करने की जरूरत तो है, लेकिन उनके नतीजों का इंतजार करने का समय नहीं है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)
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