अपना शहर चुनें

States

स्वामी केशवानंद भारती की हार की जीत

यह मुकदमा तीन साल तक चला और 24 अप्रैल 1973 को जब इस मामले का फैसला (Decision) आया तो ऊपरी तौर पर यही लगा कि केशवानंद भारती (Kesavananda Bharathi) मुकदमा हार गए और केंद्र सरकार यानी इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार मामला जीत गई.

Source: News18Hindi Last updated on: September 7, 2020, 7:30 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
स्वामी केशवानंद भारती की हार की जीत
केशवानंद भारती मुकदमा हार गए थे (फाइल फोटो)
कुछ चीजें विरोधाभासों (Contradictions) से भरी होती हैं. उनमें ऊपर से जो दिखाई देता है भीतर से वैसा होता नहीं. जिन्हें आप सामंती (feudal) और लोकतंत्र विरोधी मानते हैं उनके हाथों से लोकतांत्रिक काम हो जाते हैं और जिन्हें आप प्रगतिशील (progressive) और समाजवादी मानते हैं वे मौलिक अधिकारों के विरुद्ध खड़े दिखते हैं. स्वामी केशवानंद भारती (Swami Kesavananda Bharati) का मुकदमा कुछ वैसा ही है. यह बाबा भारती की मशहूर कहानी की तरह चर्च के संपत्ति प्रबंधन के अधिकारों (Property management rights) के लिए लड़े गए एक मठ के स्वामी के मुकदमे की हार की जीत है. एक दिन पहले 79 साल की अवस्था में उनके निधन से वह मामला और हमारे लोकतांत्रिक इतिहास (Democratic History) में उसके महत्व की स्मृतियां ताजा हो गई हैं. केरल (Kerala) के कासरगोड के एडनीर मठ के महंत परमपूज्य स्वामी केशवानंद भारती श्रीपादगलवारु की उम्र उस समय सिर्फ 29 साल की ही थी जब उन्होंने 1970 में केरल सरकार (Kerala Government) के भूमि सुधार संबंधी दो कानूनों को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में चुनौती दी थी. उनकी याचिकाएं जब लंबित थीं उसी बीच केंद्र सरकार यानी भारतीय संसद ने 24वां और 25वां संविधान संशोधन (Constitutional Amendment) पारित कर केरल के भूमि सुधार कानूनों को नौवीं अनुसूची में डाल दिया ताकि उन्हें न्यायालय में चुनौती ही न दी जा सके.

यह मुकदमा तीन साल तक चला और 24 अप्रैल 1973 को जब इस मामले का फैसला (Decision) आया तो ऊपरी तौर पर यही लगा कि केशवानंद भारती मुकदमा हार गए और केंद्र सरकार यानी इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार मामला जीत गई. लेकिन धीरे धीरे जब इस मामले की व्याख्या होने लगी तो लगा कि इस मुकदमे में लगातार तानाशाही (Dictatorship) की ओर बढ़ रही इंदिरा गांधी को जितना करारा झटका लगा है उसके मुकाबले केशवानंद भारती की जीत हुई है. उनकी निजी जीत भले नहीं हुई लेकिन उनके बहाने सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) और अपने कमजोर दिल में एक ऐसा पेसमेकर लगा दिया है जो तमाम तरह के दबावों को झेल कर लोकतांत्रिक धड़कनों को चलाए रखने की कोशिश करता है. यह एक ऐसा मुकदमा है जिससे संविधान के मूल संरचना (Basic structure) का सिद्धांत निकला. यह कहा गया कि संसद के पास अनुच्छेद 368 (Article 368) के तहत पूरे संविधान को बदलने की शक्ति है लेकिन वह मूल संरचना को नहीं बदल सकती. हालांकि मूल संरचना क्या है इसकी विस्तृत व्याख्या नहीं की गई. मूल संरचना का यह सिद्धांत न्यायमूर्ति एचआर खन्ना (Justice HR Khanna) के निर्णय में उभर रहा था और उसी के साथ यह भी उभरा कि न्यायिक समीक्षा का सुप्रीम कोर्ट का अधिकार मूल संरचना का हिस्सा है और मूल संरचना की व्याख्या करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पास है.

मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी के नेतृत्व में 13 जजों की पीठ बनाई गई थी
चूंकि गोलकनाथ का महत्त्वपूर्ण निर्णय 11 जजों की पीठ ने दिया था इसलिए इस मामले की सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश एसएम सीकरी के नेतृत्व में 13 जजों की पीठ बनाई गई और यह इस मामले में अब तक की सबसे बड़ी पीठ है रही है.गोलकनाथ के मुकदमे में कहा गया था कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती और केशवानंद भारती मामले में इस फैसले को पलट दिया गया. गोलकनाथ पंजाब के जमींदार थे तो केशवानंद केरल के महंत. इसलिए माना जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट सामाजिक क्रांति में बाधा डालते हुए यथास्थितिवादी ताकतों का साथ दे रही है. यही कारण है कि गोलकनाथ मामले को पटले जाने से प्रगतिशील ताकतें प्रसन्न हुईं. यह बात सभी को विदित है कि पीठ ने इस मामले का फैसला 7-6 के मामूली अंतर से किया था और उसके दो साल बाद देश मे आपातकाल लगा और मूल संरचना व न्यायिक समीक्षा की बात करने वाले न्यायमूर्तियों को दरकिनार करके सरकार की बात करने वाले जजों को प्रोन्नति दी गई और फिर निकली समर्पित न्यायपालिका की बात. लेकिन उससे ज्यादा अहम बात यह है कि उस मुकदमे के दौरान क्या दलीलें हुई थीं और किस तरफ से कैसे वकील खड़े थे और किसने क्या चेतावनी देते हुए कौन सी आशंका जताई थी और वे आशंकाएं कितनी सही हुईं?
विधायिका बनाम न्यायपालिका का मामला बन गया था
दरअसल यह मामला एक तरह से विधायिका बनाम न्यायपालिका का मामला बन गया था और तमाम दबावों और बीच बचाव के बावजूद आखिरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और फिर आपातकाल के रूप में वह टकराव होकर ही रहा.

अगर केशवानंद भारती के मामले को सबसे पहले जाने माने वकील जे.बी. दादाचानजी ने उठाया तो उनके साथ एन.ए. पालखीवाला जुड़ गए. उनका साथ देने के लिए सी.के. दफ्तरी, एम.सी. छागला, सोली सोराबजी और अनिल धवन खड़े हुए. सरकार की ओर से अटार्नी जनरल नीरेन डे, एलएन सिन्हा, एलएम सिंघवी और एचएम सिंघवी जैसे दिग्गज खड़े हुए. उस समय इंदिरा गांधी को वामपंथी शक्तियों का समर्थन मिल रहा था इसलिए इस मामले की एक व्याख्या यह भी चली कि एक तरफ देश में सामाजिक क्रांति और बराबरी लाने का प्रयास करने वाली इंदिरा गांधी और उनकी सरकार है तो दूसरी ओर मठों और मंदिरों के साथ खड़ी सामंती शक्तियां हैं जो भूमि सुधार कानूनों का विरोध कर रही हैं. यानी एक ओर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं तो दूसरी ओर अदालतों में काला लबादा डाले अभिजात समाज से आने वाले जज और वकील हैं जिनके भीतर पूंजीपतियों और सामंतों के हित साधने का मानस है.पालखीवाला ने संपत्ति के मौलिक अधिकार की रक्षा पर जो दलीलें दी वे आज भी प्रासंगिक
इन व्याख्याओं के पार जाकर देखें तो पाएंगे कि उस समय एन.ए. पालखीवाला ने संपत्ति के मौलिक अधिकार की रक्षा के बहाने जो दलीलें दी थीं वे आज कितनी प्रासंगिक हैं. पालखीवाला ने मुख्य निशाना अनुच्छेद 31C पर लगाया था. बाद में उन्होंने 1974 यानी मुकदमे का फैसला होने के एक साल बाद `अवर कांस्टीट्यूशन डिफेस्ड एंड डिफाइल्ड’ करके एक किताब भी लिखी. पालखीवाला ने इस किताब में 31C बाकायदा एक अध्याय देकर यह बताया कि संविधान के अनुच्छेद 31, जो कि पहले संपत्ति को मौलिक अधिकार देता था, में किया गया यह संशोधन हमारी मूल संरचना पर पांच प्रकार से घात करता है. यह संशोधन यह कहता है कि नीति निदेशक तत्वों की किसी भावना का प्रतिनिधित्व करते हुए ऐसा कानून बनाया जा सकता है जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हो लेकिन उसे अनुच्छेद 13 के तहत खारिज नहीं किया जा सकता.

पालखीवाला ने स्पष्ट तरीके से कहा कि भारत में संसद अंतर्निहित सीमाओं में काम करती है और वह संविधान की मूल संरचना को नहीं बदल सकती. उन्होंने कहा कि अगर संसद अपनी मनमर्जी से संविधान में संशोधन करने लगेगी तो स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी और एक अधिनायकवादी सरकार स्थापित हो जाएगी और यह दलील किसी डर पर आधारित न होकर वास्तविकता पर आधारित है. उनका कहना था कि 31C मौलिक अधिकारों को नीति निदेशक तत्वों के अधीन लाता है और वह खतरनाक है. पालखीवाला से कई जजों ने पूछा कि क्या संविधान संशोधन के माध्यम से राजतंत्र स्थापित होने की आशंका है उन्होंने कहा बिल्कुल है. वकील छागला ने कहा कि संसद और कार्यपालिका पर यह भरोसा कर लेना कि वह मनमाने ढंग से काम नहीं करेगें गलतफहमी है और यह सोच भारत में सीमित सरकार की अवधारणा के विरुद्ध भी है. भारत में इस सोच को स्वीकार नहीं किया गया है.

संविधानविद एच.एम. सीरवी ने सरकार की तरफ से पैरवी की और मुकदमा जीता
इस मुकदमे का रोचक पहलू यह है कि महाराष्ट्र सरकार के अटार्नी जनरल और महान संविधानविद एच.एम. सीरवी ने सरकार की तरफ से पैरवी की और मुकदमा भी जीता. उनका कहना था कि संसद अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर ही नहीं सकती. इसके अलावा मौलिक अधिकार मानवाधिकार नहीं हैं बल्कि सामाजिक अधिकार हैं जो संविधान लागू होने से पहले नहीं थे. हालांकि उन्होंने माना कि लोकतंत्र, संघीय संरचना, कानून का राज और न्यायिक समीक्षा संविधान का मूल चरित्र है लेकिन यह भी कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने उन्हें कोई स्थायी स्वरूप नहीं माना था. लेकिन जब बाद में देश में आपातकाल लगा तो एचएएम सीरवी जैसे न्यायविद ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पालखीवाला और न्यायमूर्ति एचआर खन्ना की बात को स्वीकार किया. इस मुकदमे की दलील के दौरान पालखीवाला और सीरवी के बीच तीखी नोकंझोंक भी हुई और जिसके चलते इन दो मित्रों के बीच वर्षों तक बातचीत बंद रही.

इन बातों के अलावा जो चीज जानने लायक है और जिसका जिक्र `वर्किंग ए डेमोक्रेटिक कांस्टीट्यूशन’ में ग्रैनविल आस्टिन किया है, वह है 13 जजों की संविधान पीठ पर काम करने वाला दबाव. आस्टिन लिखते हैं कि संविधान पीठ जबरदस्त दबाव के तहत काम कर रही थी. एक दबाव तो जजों और वकीलों का था जो इस मामले में शामिल थे. उनके भीतर न्यायपालिका की स्वायत्तता को लेकर भी चिंता थी. दूसरा दबाव था सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों का. पीठ के भीतर की सूचनाएं पाने में निरंतर लगे रहने वाले मंत्रियों में कानून मंत्री गोखले, इस्पात मंत्री कुमारमंगलम, विधि आयोग के अध्यक्ष गजेंद्रगडकर और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय थे. इसके अलावा न्यायमूर्ति एच.एम. बेग और न्यायमूर्ति एस.एन. द्विवेदी अपने फैसले का मसविदा सरकार के पास पहले ही पहुंचा चुके थे. न्यायमूर्ति रेड्डी ने तो यहां तक लिखा है कि मोहनकुमारमंगलम ने हमारे सहयोगियों को फैसले के एक हफ्ते से पहले ही बधाई दे दी थी. हालांकि ग्रैनविल आस्टिन से बातचीत में मुख्य न्यायाधीश सीकरी ने इस तरह की बातों को अफवाहों के रूप में स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि अगर सरकार चाहती तो हम मसविदा भेज देंते क्योंकि इसमें कुछ भी गोपनीय नहीं था.

यह भी पढ़ें: SC ने खाली पदों को लेकर केंद्र से जताई नाराजगी, 15 सितंबर को करेगा सुनवाई

आज 47 साल बाद केशवानंद भारती की उस हार को लोकतंत्र जीत के रूप में देखने की आवश्यकता है. लेकिन साथ ही पालखीवाला की उस बात को याद रखने की जरूरत है कि, ``स्वतंत्रता हमारी रक्तधारा में विरासत में आने वाली चीज नहीं है. हर पीढ़ी को अपने लिए उसकी रक्षा करनी होती है. तभी वह बचती है और आप दूसरी पीढ़ी को उसे स्थानांतरित कर सकते हैं. लोकतंत्र अगर सर्वसत्तावादी राज्य में मरती है तो वह लोकतंत्र में भी धीमी मृत्यु को प्राप्त होती है. जब स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है तो `एक व्यक्ति एक वोट’ की भूसी ही बचती है.’’
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 7, 2020, 7:30 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर