बावरा मन: एक अनूठी चित्रकथा - चिकनकारी से कढ़ी और जुड़ी महिलाओं की कहानी!

‘चौक बाजार की पारचे वाली गली’ में चिकनकारी के कच्चे काम वाली, अधबनी साड़ियों की गठरियां बिका करती थीं. आज भी बिकती हैं. इन गठरियों में गांव की महिलाओं द्वारा कढ़ी हुई साड़ियां होती हैं. इन पे चिकन का कच्चा काम हुआ होता है. धुलाई, फिनिशिंग आदि नहीं हुई होती.

Source: News18Hindi Last updated on: September 25, 2021, 3:20 PM IST
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बावरा मन: एक अनूठी चित्रकथा - चिकनकारी से कढ़ी और जुड़ी महिलाओं की कहानी!
‘चौक बाजार की पारचे वाली गली’ में चिकनकारी के कच्चे काम वाली, अधबनी साड़ियों की गठरियां बिका करती थीं. आज भी बिकती हैं. इन गठरियों में गांव की महिलाओं द्वारा कढ़ी हुई साड़ियां होती हैं. इन पे चिकन का कच्चा काम हुआ होता है. धुलाई, फिनिशिंग आदि नहीं हुई होती.


मेरी सास कहती थीं, ‘आदमी एक रुपया कमाता है, तो उससे पुड़िया खा लेता है. महिला एक रुपया कमाती है तो वो उसे घर पर लगाती है.


जब तक सास थीं, मैंने इस कमाने और घर चलाने के पीछे की कहानी कभी जानने की कोशिश नहीं की. लेकिन, उनके जाने के बाद, अचानक मेरी झोली में कारीगरों से जुड़ी संस्था की जिम्मेदारियां क्या आईं, नए अनुभव मिलने लगे. इसी एक अनुभव को आज आपसे सांझा करने का मन हो उठा है.


कमाल की महिला से मुलाकात

राना अहमद जब उस दिन क्राफ्ट्स काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के ऑफिस में आईं, तो लगा एक आम परदानशीं महिला जो चिकनकारी का काम करती हैं, अपने कागज़ दिखाने आईं हैं. उनके नाम का नॉमिनेशन हमें ऑल इंडिया सालाना इनाम के लिए, चेन्नई भेजना था. डॉक्यूमेंट्स की स्क्रुटनी करनी थी, फॉर्म भरने में उनकी मदद करनी थी.


डॉक्यूमेंट्स देखते देखते, फॉर्म का एक कॉलम भरने के लिए हमने जब उनसे पूछा कि उन्होंने अपनी कला में क्या नायाब, नया प्रयोग किया है. वो बोलीं, ‘मैंने चिकनकारी से कहानी कही है. चिकनकारी से कहानी, और वो भी तमाम चिकनकारी के विलुप्त होते टांकों के साथ.


साधना भाभी और हमने एक दूसरे को देखा. अभी तक हमने साड़ियों, सूट, दुपट्टों, मेजपोश, नैपकिन, ट्रे कवर, पर्दों आदि पर ही चिकनकारी देखी थी. चिकनकारी को कहानी का माध्यम बनते नहीं देखा था. इसलिए ज़रा आश्चर्य हुआ.


लेकिन राना जी ने जब अपनी बनाई/टांकी/काढ़ी हुई ये कहानियां दिखायीं, आंखें खुली की खुली ही रह गईं.


कढ़ी हुई तस्वीरें

पेचवर्क और लखनऊ की चिकनकारी से कढ़ी पहली तस्वीर, लखनऊ की विरासत की कहानी बयां कर रही थी. इस बोलती हुई तस्वीर में बहती हुई गोमती है. गोमती में अठखेलियां करती हुईं मछलियां हैं. ये मछलियां लखनऊ की तहजीब की पुरानी निशानियां हैं. और फिर तस्वीर में एक तरफ़ गोमती किनारे खड़ा बुलंद, रूमी दरवाज़ा भी है.


चिकनकारी के टांकों से यूं लखनऊ को दी हुई सलामी, दिल को छू गई. लेकिन, सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली तस्वीर वो थी जिसमें चिकनकारी से जुड़ी महिला कारीगरों की जिंदगी को बयां किया गया है. इस चित्रकथा में राना जी ने अपनी मां को ध्यान में रख कर, मां की संघर्ष यात्रा का अनुभव सांझा किया है. वो यात्रा जो चिकनकारी से जुड़ी हजारों महिलाओं की कहानी है.


राना जी की मां

70 के दशक के लखनऊ की बात है. परिवार बड़ा था, पति की आमदनी कम. ऐसे में परिवार पालने और बच्चों को अच्छा भविष्य देने के लिए, रानाजी की मां, खैरुन निसां ने चालीस पैसा एक रुमाल के दर पर चिकनकारी का काम शुरू किया. हाथ साफ़ था, जहां जाती, सैंपल पास हो जाते. अच्छा काम मिलने लगा.


एक दिन ‘चौक बाजार की पारचे वाली गली से गुज़र रही थीं, जहां चिकनकारी के कच्चे काम वाली, अधबनी साड़ियों की गठरियां बिका करती थीं. आज भी बिकती हैं. इन गठरियों में गांव की महिलाओं द्वारा कढ़ी हुई साड़ियां होती हैं. इन पे चिकन का कच्चा काम हुआ होता है. धुलाई, फिनिशिंग आदि नहीं हुई होती. खैरुन निसां ने पटरी वाले से गठरी का दाम पूछा तो वो बोला, आप ना ले पाएंगी.


खैरुन निसां को बुरा लगा, बोलीं, ‘हम लें न लें, दाम तो बताओ’.


पटरी वाला बोला, ‘पांच हज़ार रुपया’


खैरुन निसां बोलीं, ‘लाओ दो, हमने खरीद ली. किसी को साथ भेजो तो पैसा भी भिजवा दें.’


गठरी से बदली किस्मत





गठरी में 25 साड़ियां थीं. खैरुन निसां और उनकी बड़ी बेटियों ने मिल कर जाली बनाई. उसकी फिनिशिंग की और काम सुंदर होने के कारण वो साड़ियां बड़े शोरूम पर झट से बिक गईं. अब गठरियाँ आती गईं, मां बेटियां जालियां बनाती गईं, साड़ियों को सजाती गईं और काम चल निकला.


खैरुन निसां ने धीरे धीरे अपनी गली मोहल्ले की लड़कियों के लिए सेंटर खोल लिया. काम बढ़ने लगा. और वो नई लड़कियों को काम सिखाने भी लगीं. अगली पीढ़ी तैयार करने लगीं.


शेरों के बीच मुर्गी कैसी

ऐसे में यूपी हैंडलूम का चिकनकारी का टेंडर खुला. बोली लगाने वालों में इन मर्दों की भीड़ में खैरुन निसां अकेली महिला थीं. शहर के बड़े बड़े व्यापारी, शोरूम मालिक, बोली में शामिल थे. सबने खैरुन निसां को देखा, बोले,शेरों के बीच में ये मुर्गी कहां से आई.लेकिन किस्मत देखिए, कम रेट करने वाली मुर्गी यानि खैरुन निसां को काम मिल गया.


बड़े बड़े व्यापारियों, शोरूम मालिकों को बुरा न लगे इसलिए


खैरुन निसां ने खुद मशवरा दिया कि वो नई हैं, तजुर्बा कम है. सब मिल बांट के काम कर लेते हैं. उनके कहने पे यूपी हैंडलूम वालों ने 60:40 के अनुपात पर काम बांट दिया. लेकिन तब भी 60% का काम खैरुन निसां की ही झोली में आया.


खैरुन निसां का काम चल निकला था. सब तरफ़ उनकी धूम हो गई थी. उन्हें इनाम मिलने लगे थे. एक बार इराक के एक मंत्री भारत आए हुए थे. खैरुन निसां के सेंटर पर उनकी खास विजिट करवाई गई. सेंटर के काम से खुश हो मंत्री जी ने खैरुन निसां को इनाम में एक सोने की गिन्नी दी थी.


अपनी औलाद, जिनके लिए खैरुन निसां ने अपने जीवन में इतना संघर्ष किया था, वो आज उनकी दी हुई विरासत को ही संभाल रहे हैं. चिकनकारी का काम कामयाबी से कर रहे हैं. खुद छोटी बेटी राना अहमद, 1997 में चिकनकारी की कला में नेशनल अवॉर्डी हैं. वो ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और श्रीलंका में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं, वहां के मेलों में भारत की नुमाइंदगी कर चुकी हैं. अब चिकनकारी से कहानी काढ़ रही हैं.


चिकनकारी में महिलाओं का योगदान

दरअसल, चिकनकारी का एक खास पहलू यह है कि उसमें 96 फीसदी महिलाएं ही काम करती हैं. अवध की लगभग तीन लाख औरतें इसी कसीदेकारी से जुड़ी हुई हैं.


धुलाई, रंगाई और छपाई के काम में ज़रूर कुछ मर्द लगे हैं, पर कढ़ाई में तो महिलाएं ही नज़र आती हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं लखनऊ में गोमती नदी के पार के पुराने इलाकों में बसी हुई हैं. इन इलाकों में घर घर चिकनकारी का काम होता है. लखनऊ की यह परदेदार औरतें मुफ्ती गंज, ठाकुरगंज, तोपखाना, हुसैनाबाद, सआदतगंज, शीश महल, रईस मंजिल, मौलवीगंज, गोसाईंगंज में रहती हैं.


आज चिकन की कला, सिर्फ़ लखनऊ शहर तक ही सीमित नहीं है, लखनऊ तथा आसपास के अंचलों के गांव-गांव तक ये फैल चुकी है. जिले से बाहर मोहान, संडीला, मलीहाबाद, काकोरी आदि स्थानों पर भी चिकन का काम होता है.


इन 96% महिलाओं में से ही एक परदेदार, राना जी ने अपनी कढ़ी तस्वीर में न सिर्फ़ चिकनकारी के टांके जिंदा रखने की कोशिश की है, बल्कि उन्होंने इस तस्वीर से अपने माशरे की महिलाओं की असल जिंदगी को भी शोकेस किया है. महिलाएं, जो घरों और पर्दों में रह कर भी अपने घर, परिवार चला रही हैं. अपने बच्चे पाल रही हैं. नारी सशक्तिकरण का नारा बुलंद कर रही हैं.


राना जी की इस तीसरी तस्वीर में ये ‘96% महिलाएं’ काले परदे में छुपी, सिर्फ़ अपनी चमकती आंखों से नज़र आ रहीं हैं. राना जी ने इन महिलाओं, उनके बच्चों को, उनकी दिनचर्या को धागों में पिरो कर, बांध कर अपनी तस्वीर में दिखाया है.


और तस्वीर में उगते हुए सूरज को दिखा कर, उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना भी की है.


 चिकन से महिलाओं का सांस्कृतिक जुड़ावचिकन की परवरिश मल्लिकाओं और बेगमों की ‘जनानी ड्योड़ियों’ में कनीज़ों और खासों के हाथों से हुई है. नवाबी जमाने में मलमल के कुर्ते पर जूही के हार इस खूबसूरती से बनाए जाते थे कि देखने वाले समझते थे कि पहनने वाला, गले में फूलों का ताजा गजरा डाले हुए है. चिकन का सबसे कीमती टांका, यही होता है


जिसे मुर्री या मुंडी कहते हैं. चिकनकारी में 32 तरह के टांगों का इस्तेमाल होता है जिसमें मुर्री, बखिया, उल्टी बखिया, जाली, तेपची, हथकटी, फंदा, चना पत्ती, धनिया, लौंग पत्ती, कील, बिजली, कंगन, क्षूमकटि आदि प्रमुख हैं. गजब की बात ये है कि इन टांकों का नामकरण भी एक नारी प्रधान कला के हिसाब से ही हुआ लगता है.


सुई धागे से कहानी

ख़ैर, राना जी का चिकनकारी द्वारा कहानी लिखने का अंदाज़ मेरे बावरे मन को बहुत पसंद आया. उनकी मां का संघर्ष और उनका entrepreneur बनने का सफ़र, अपने आप में एक अद्भुत कहानी कहता है. चिकनकारी की कला के संदर्भ में एक महिला की कहानी, एक महिला की नज़र से, मेरे लिए एक अनूठा अनुभव था. एक सबक भी था, कि एक महिला के लिबास से सशक्तिकरण को कभी आंका नहीं जा सकता.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ज्योत्स्ना तिवारी

ज्योत्स्ना तिवारीअधिवक्ता एवं रेडियो जॉकी

ज्योत्सना तिवारी अधिवक्ता हैं. इसके साथ ही रेडियो जॉकी भी हैं. तमाम सामाजिक कार्यों के साथ उनका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लेखन का कार्य भी वो करती हैं.

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First published: September 25, 2021, 3:18 PM IST
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