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Shayari: 'रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले', शायरों के कलाम और गुनगुनाते अल्‍फ़ाज़

'जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है...' Image/pexels-Ir-Solyanaya

Shayari: शेरो-सुख़न (Urdu Shayari) की दुनिया में अल्‍फ़ाज़ के मोती बिखरे मिलते हैं. इसमें कहीं दिलों के ख़ूबसूरत जज्‍़बात पिरोए गए हैं, तो कहीं ख़ामोशी में भी अल्‍फ़ाज़ गुनगुनाते महसूस होते हैं...

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    Shayari: उर्दू शायरी (Urdu Shayari) जज्‍़बातों की दुनिया है. वैसे तो शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को जगह दी गई है, मगर कहीं इसमें अल्‍फ़ाज़ के मोती पिरोए गए हैं, तो कभी ख़ामोशी को भी शब्‍दों में बांधा गया है. हर शायर के यहां इसे बयां करने का दिलकश अंदाज़ मिलता है. कहीं इश्‍क़ से लबरेज़ ख़ामोशी का जिक्र है, तो कहीं ख़ामोश आंखों की तहरीर को उर्दू शायरी में पूरी तरह तवज्‍जो मिली है. कहीं महबूब की ख़ूबसूरती के बहाने इसका बयान मिलता है, तो कहीं शायरों ने मुहब्‍बत भरे दिल की बात ख़ामोशी से मगर ख़ूबसूरत अल्‍फ़ाज़ की अदायगी के साथ कही है. आज यहां पेश हैं शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम, जो आपके दिल को कुछ देर के बांधे रखने में कामयाब रहेंगे. आज की इस कड़ी में पेश हैं 'ख़ामोशी' पर शायरों का नज़रिया और उनके कलाम के चंद रंग. आप भी इसका लुत्‍फ़ उठाइए और महसूस कीजिए कि कैसे ख़ामोश फ़ज़ाओं में भी अल्‍फ़ाज़ के मोती बिखरते हैं-

    रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले
    बहुत तड़पी कोई आवाज़ मरने से ज़रा पहले
    ख़ुशबीर सिंह शाद

    असर भी ले रहा हूं तेरी चुप का
    तुझे क़ाइल भी करता जा रहा हूं
    फ़िराक़ गोरखपुरी

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    कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत
    जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है
    नातिक़ लखनवी

    मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूं
    कितना ख़ामोश हूं मैं अंदर से
    जौन एलिया

    हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी
    और वो समझे नहीं ये ख़ामुशी क्या चीज़ है
    निदा फ़ाज़ली

    उसे बेचैन कर जाऊंगा मैं भी
    ख़मोशी से गुज़र जाऊंगा मैं भी
    अमीर क़ज़लबाश

    ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है
    तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है
    शाद अज़ीमाबादी

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    चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़
    तस्वीर-ए-यार को है मिरी गुफ़्तुगू पसंद
    दाग़ देहलवी

    ज़ोर क़िस्मत पे चल नहीं सकता
    ख़ामुशी इख़्तियार करता हूं
    अज़ीज़ हैदराबादी (साभार/रेख्‍़ता)
    Published by:Naaz Khan
    First published: