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उदयपुर: पृथ्वी की शुरुआत के नए सुराग! अरावली की गोद से मिला दो अरब साल पुरानी चट्टानों में छुपा रहस्य

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Agency:Local18
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Udaipur: उदयपुर की इसवाल घाटी में दो अरब साल पुरानी चट्टानों में मिले ‘ऊइड्स’ ने वैज्ञानिकों की पुरानी धारणाओं को चुनौती दी है. शोध में पाया गया है कि ये संरचनाएँ जीवों के बिना भी (अजैविक प्रक्रियाओं से) बन सकती थीं, जिससे पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और अन्य ग्रहों पर जीवन-खोज की प्रक्रिया पर नए सवाल उठे हैं.

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उदयपुर. पृथ्वी के शुरुआती इतिहास को समझने में राजस्थान के उदयपुर जिले ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. अरावली पर्वत श्रृंखला के इसवाल क्षेत्र में भूविज्ञानियों की एक टीम ने ऐसी प्राचीन चट्टानों की खोज की है, जिनकी उम्र लगभग दो अरब वर्ष बताई जा रही है. इन चट्टानों में ‘ऊइड्स’ (Ooids) नामक सूक्ष्म गोलाकार कार्बोनेट संरचनाएँ मिली हैं, जो पृथ्वी के शुरुआती वातावरण और जीवन की उत्पत्ति से जुड़े बड़े सवालों को नए सिरे से देखने का मौका दे रही हैं.

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यह खोज भूविज्ञान की स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती है:

  • पुरानी धारणा: अब तक वैज्ञानिक रूप से माना जाता था कि ऊइड्स जैसी संरचनाएँ समुद्री जीवों या माइक्रोबियल गतिविधियों (Biotic processes) का परिणाम होती हैं.
  • नई चुनौती: उदयपुर में मिली संरचनाओं पर किए गए विश्लेषण ने इस धारणा को चुनौती दी है. टीम के वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि ये ऊइड्स अजैविक (Non-Biotic) रासायनिक प्रक्रियाओं से भी उत्पन्न हो सकते हैं.

इसका सीधा अर्थ है कि इनके बनने के पीछे किसी भी प्रकार के जीव या माइक्रोब का होना आवश्यक नहीं था. यह खोज पृथ्वी पर जीवन के आरंभिक दौर को समझने में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है, क्योंकि यह जीवन-चिह्न को परिभाषित करने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है.

प्रारंभिक पृथ्वी के वातावरण की झलक
विशेषज्ञों के अनुसार, इन संरचनाओं का निर्माण रासायनिक प्रतिक्रियाओं, खनिजों के जमाव और प्राकृतिक भू-रासायनिक प्रक्रियाओं से हुआ. यह निर्माण उस काल की झलक देता है जब पृथ्वी का वातावरण, समुद्री जल की संरचना और तापमान आज से बिल्कुल अलग थे.यह अध्ययन बता रहा है कि शुरुआती पृथ्वी पर कई बार प्रकृति स्वयं ऐसी आकृतियाँ बना सकती थी, जिन्हें आज वैज्ञानिक जीवन-चिह्न (Biosignatures) मानते हैं.

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अन्य ग्रहों पर खोज के तरीकों में बड़ा बदलाव संभव
इस खोज का महत्व केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध एस्ट्रोबायोलॉजी (Astrobiology) से है.

वैज्ञानिकों ने संकेत दिया है कि मंगल और दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज के तरीकों पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा.यदि बिना जीवों की उपस्थिति के भी सूक्ष्म कार्बोनेट संरचनाएँ बन सकती हैं, तो दूसरे ग्रहों पर मिली समान संरचनाओं को सीधे “जीवन का प्रमाण” मानना गलत साबित हो सकता है. यह अध्ययन भविष्य की रिसर्च के लिए नए मानदंड तय कर सकता है, जिससे जीवन-चिह्नों की पहचान और अधिक सावधानी से की जाएगी.

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अरावली — पृथ्वी का प्राचीन संग्रहालय
अरावली पर्वत श्रृंखला को पहले ही भू-वैज्ञानिक खजाने के रूप में मान्यता मिली है, लेकिन इस खोज ने इसे एक बार फिर विश्व-स्तर पर स्थापित किया है. इसवाल क्षेत्र में आगे और गहन अध्ययन की तैयारी हो रही है, ताकि इन प्राचीन संरचनाओं की उम्र, रासायनिक परतें और बनने की परिस्थितियों को समझा जा सके. उदयपुर की यह खोज अब वैश्विक भूवैज्ञानिक समुदाय के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुकी है.

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