कोरोना का आइसोलेशन नया नहीं, ये जीव भी बीमार होने पर रहने लगता है अलग

वे समूह से खुद को अलग-थलग कर लेती हैं ताकि बीमारी न फैले (प्रतीकात्मक तस्वीर)
वे समूह से खुद को अलग-थलग कर लेती हैं ताकि बीमारी न फैले (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मरीज चींटियां काम या तो बंद कर देती हैं या उसे एकदम घटा देती हैं, जिससे वे दल से दूर रह सकें. ये सिक-लीव (sick leave) से मिलती-जुलती प्रक्रिया है.

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कोरोना वायरस (corona virus) से संक्रमित लोगों के इलाज के लिए फिलहाल तक कोई दवा नहीं आ सकी है. पैरासिटामोल (paracetamol) और काउंसलिंग को ही इसके इलाज का तरीका माना जा रहा है. साथ ही मरीजों को आइसोलेशन वार्ड (isolation ward) में रखा जाता है ताकि बीमारी न फैले. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आइसोलेशन का कंसेप्ट हम इंसानों तक ही सीमित नहीं. चींटियां भी बीमार होने पर खुद को स्वस्थ चींटियों से अलग कर लेती हैं.

रियल टाइम डाटा के लिए प्रामाणिक मानी जाने वाली वेबसाइट worldometers की मानें तो 7 मार्च तक पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के कुल 102,262 मामले आ चुके हैं. ये नंबर हर दिन के साथ बढ़ते जा रहे हैं. बलगम, थूक के जरिए फैलने वाली बीमारी को रोकने में आइसोलेशन को खासी तवज्जो दी जा रही है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इलाज के दौरान मरीज को अलग रखा जाए तो कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी प्रिवेंट की जा सकती है. आइसोलेशन के लिए मरीज और उसके परिवार को तैयार करने के लिए काउंसलिंग देने की जरूरत हो रही है. वहीं दूसरी तरफ चींटियों में खुद ही ये प्रवृति पाई जाती है.

लेती हैं सिक लीव
Newsweek में छपी खबर के मुताबिक वैज्ञानिक मानते हैं कि चींटियां सिक लीव लेती हैं ताकि उनकी वजह से उनके साथियों को बीमारी न लग जाए. साइंस नामक विज्ञान और चिकित्सा जर्नल में ये खोज प्रकाशित हुईं. इसके अनुसार बीमार चींटियां अपने दूसरी चींटियों को बीमारी से बचाने के लिए अपने रूटीन और व्यवहार में कई बदलाव करती हैं, बीमारी में छुट्टी लेना इनमें से एक है.
क्यों हो रहा चींटियों पर शोध


इन दिनों चींटियों को खास तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि ये माना जाता है कि उनमें 'सुपरह्यूमन पावर' होती है. वे अपने वजन से लगभग 50 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं. वहीं एशियन वेबर चींटी अपने वजन से सौ गुना ज्यादा वजन उठा लेती है. कान न होने के बाद भी ये नन्हा सा जीव वाइब्रेशन के जरिए साथी चींटियों का सिग्नल सुनता है. सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि चींटियों के दो पेट होते हैं. एक पेट में इकट्ठा खाना वे खुद खाती हैं तो दूसरे पेट का खाना वे साथियों के लिए ले जाती हैं. इस प्रक्रिया को trophallaxis कहते हैं. हर चींटी को अपनी उम्र और योग्यता के अनुसार अलग काम दिया जाता है. जैसे नई-नई मां बनी चींटियां शिशु चींटी की देखभाल तो अधिक उम्र की चींटियां खाना लाती हैं. बिना भाषा के भी ये आपस में संवाद करती हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में 'एंटरनेट' नाम दिया गया है. एक खास हार्मोन के जरिए ये कनेक्शन बनता है और आपसी तालमेल का काम करता है.

इस तरह हुई रिसर्च
बीमारी के दौरान इनका व्यवहार समझने के लिए ऑस्ट्रिया और स्विटरजरलैंड के शोधकर्ताओं ने चींटियों के व्यवहार पर शोध किया. इसके लिए उन्होंने चींटियों की बस्ती जिसे कॉलोनी भी कहते हैं, का चुनाव किया, जहां ज्यादा संख्या में चींटियां रहती थीं. इन बस्तियों में लगभग 22सौ चींटियों की रिहाइश थी. यहां पर इंफ्रारेड कैमरा लगाया गया ताकि उनकी हरेक गतिविधि पर नजर रखी जा सके. इसके बाद लगभग 10 प्रतिशत चींटियों को Metarhizium brunneum यानी एक ऐसे फंगस के संपर्क में लाया गया जो चींटियों में बीमारी फैलाने का काम करते हैं. शोधकर्ताओं ने इस फंगस का लो-डोज़ उन्हें दिया ताकि वे मरे नहीं लेकिन उनकी काम करने की क्षमता कम हो जाए.

चली गईं आइसोलेशन में
ऑस्ट्रिया के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की मुख्य शोधकर्ता सिल्विया क्रेमर के अनुसार फंगस के संपर्क में आने के बाद चींटियों का व्यवहार बदल गया. बीमार चींटियां अपने साथियों से दूर रहने लगीं ताकि उनकी बीमारी दूसरों को न लग जाए. बीमार चींटियां साथ रहने लगीं और मुख्य दल से एकदम अलग-थलग हो गईं. बीमार चींटियां खासकर शिशु और रानी चींटियों से अलग रहने लगीं ताकि उनकी जिंदगी खतरे में न आए. ऐसा करने की प्रक्रिया में मरीज चींटियां काम या तो बंद कर देती हैं या उसे न्यूनतम कर देती हैं, जिससे वे दल से दूर रह सकें. ये सिक-लीव से मिलती-जुलती प्रक्रिया है.

शोध में पाया गया कि अक्सर बाहर खाना एकत्र करने वाली चींटियां पैथोजन के संपर्क में आती और बीमार होती हैं. ऐसे में वे बाकी समूह से खुद को अलग-थलग कर लेती हैं. ये एक तरह से वैक्सिनेशन की तरह काम करता है. दोबारा उसी पैथोजन के संपर्क में आने पर चींटियों में प्रतिरक्षा तंत्र तेजी से काम करता है और पैथोजन उन पर बेअसर रहता है.

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