सरकारी योजनाओं का लाभार्थियों से प्रचार करवाने पर मचा सियासी संग्राम
लाभार्थी इस बार चुनावी मुद्दा बनने जा रहे हैं. कांग्रेस लाभार्थियों के राजनीतिक इस्तेमाल को चुनावी मुद्दा बनाएगी.
सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को चुनावी साल में सरकार के प्रचार का जरिया बनाने पर सियासी संग्राम मच गया है. लाभार्थी इस बार चुनावी मुद्दा बनने जा रहे हैं. कांग्रेस लाभार्थियों के राजनीतिक इस्तेमाल को चुनावी मुद्दा बनाएगी. चुनावी साल में लाभार्थियों के मुंह से सरकार की योजनाओं का प्रचार विपक्षी पार्टियों को अखर गया है. अब लाभार्थी पॉलिटिक्स पर भाजपा और कांग्रेस के बीच वाक् युद्ध शुरू हो गया है.
पीएम की सभा में 12 सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को बुलाने का फार्मूला हिट होने के बाद भाजपा ने चुनावी साल में इस फार्मूले का दूसरा इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. इसके तहत अब लाभार्थियों के अनुभवों के वीडियो बनाकर शेयर किए जा रहे हैं. कांग्रेस ने इस पर गहरी आपत्ति जताई है. कांग्रेस का आरोप है कि सरकारी योजना का लाभ देना हर सरकार का दायित्व होता है, जबकि इसके बहाने राजनीति की जा रही है.
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भामाशाह योजना रही है खूब चर्चा में
यह पहला मौका नहीं है जब सरकारी योजनाओं और लाभार्थियों को लेकर राजनीति गरमाई है. अब तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं देने और योजनाओं का लाभ नहीं मिलना चुनावी मुद्दा बनता रहा है, लेकिन इस बार योजनाओं का लाभ देना और लाभार्थी के मुंह से उसका बखान करवाना चुनावी मुद्दा बन रहा है. इससे पहले भामाशाह कार्ड को लेकर खूब सियासत हो चुकी है. 2003 में सीएम वसुंधरा राजे की सरकार की भामाशाह योजना को कांग्रेस ने सत्ता में आते ही बंद कर दिया. 2013 में दोबारा सत्ता में आने पर राजे ने फिर इस योजना को शुरू किया. अब कांग्रेस के नेता फिर कह रहे हैं कि कांग्रेस सता में आने पर भामाशाह कार्ड रद्दी की टोकरी में जाएगा.
योजनाओं के नाम पर होती रही है राजनीति
इसी तरह योजनाओं के नाम बदलने पर भी पिछले चार साल में सियासी पारा खूब गर्म रहा. राजीव गांधी सेवा केंद्रों का नाम अटल सेवा केंद्र करने पर कांग्रेस ने खूब आरोप लगाए थे. इससे पहले कांग्रेस राज में गुरु गोलवलकर योजना को बंद किया गया था. लेकिन इस बार मसला दूसरा है. इससे पहले भाजपा के नेता और कार्यकर्ताओं ने लाभार्थियों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में सरकार का प्रचार शुरू कर दिया है.
