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    जब हिमाचल में हुआ महाराष्ट्र जैसा सियासी ड्रामा और वीरभद्र को देना पड़ा इस्तीफा!

    हिमाचल में भी हुआ था महाराष्ट्र जैसा सियासी ड्राम. (सांकेतिक तस्वीर)
    हिमाचल में भी हुआ था महाराष्ट्र जैसा सियासी ड्राम. (सांकेतिक तस्वीर)

    Politics of Himachal: 22 मार्च 1998 को शिमला (Shimla) के पीटरहॉफ में तत्कालीन भाजपा प्रदेश प्रभारी नरेंद्र मोदी (Narender Modi) की मौजूदगी में भाजपा-हिविकां गठबंधन पर फैसला हुआ था. बाद में यह सरकार पांच साल तक चली थी.

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    शिमला. महाराष्ट्र (Maharashtra) में चल रहा सियासी घमासान साल 1998 की याद दिलाता है. इस सियासी घटनाक्रम ने हिमाचल की राजनीति के अतीत सामने लाकर खड़ा कर दिया है. 1998 में कांग्रेस और भाजपा में कुछ इसी तरह का घमासान मचा था. दरअसल, 1998 में हिमाचल विधानसभा के लिए चुनाव हुए. कुल 65 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस को 31 सीटें मिली और भाजपा को 29 सीटों से संतोष करना पड़ा. एक सीट पर मौजूदा भाजपा विधायक रमेश ध्वाला आजाद जीते थे. ध्वाला ने कांग्रेस और भाजपा सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई थी. क्योंकि पहले ध्वाला ने कांग्रेस और बाद में भाजपा को समर्थन दिया था.

    वीरभद्र को देना पड़ा इस्तीफा
    पहली बार निर्दलीय विधायक जीते रमेश धवाला के पाला बदलने से प्रदेश में काफी सियासी उठापटक हुई. हालांकि, कांग्रेस सरकार एक पखवाड़े तक चल सकी थी और वीरभद्र सिंह ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद 24 मार्च 1998 को भाजपा ने हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ सरकार का गठन किया, जोकि पांच साल तक चली थी.  प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल भाजपा और हिविकां की गठबंधन सरकार में पहली बार मुख्यमंत्री बने.

    हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह. (FILE PHOTO)
    हिमाचल के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह. (FILE PHOTO)

    इस तरह चली सियासी उठापटक


    दरअसल, साल 1998 में सूबे की 65 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव हुए. कांग्रेस 31 सीटों पर जीत दर्ज करने के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. बहुमत का आंकड़ा 33 था. हालांकि, उसे बहुमत नहीं मिला. भाजपा के खाते में 29 सीटें गई. भाजपा के मास्टर वीरेंद्र धीमान का परिणाम आने से पहले निधन हो गया और भाजपा के पास 28 विधायक रह गए. सुखराम की पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) के चार विधायक विधानसभा पहुंचे.

    हिविकां का कांग्रेस को समर्थन से इंकार
    चुनाव के बाद हिविकां ने कांग्रेस को समर्थन देने से इंकार कर दिया. वीरभद्र सिंह और पंडित सुखराम एक दूसरे के धुर-विरोधी थे. बताया जाता है कि सुखराम ने शर्त रखी थी कि अगर वीरभद्र सिंह के अलावा, अगर कांग्रेस से कोई और सीएम बनेगा, तभी वह समर्थन देंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बाद में हिविकां ने भाजपा के साथ सरकार बनाई थी.

    ध्वाला को भाजपा ने नहीं दिया था टिकट
    रमेश धवाला चुनाव में भाजपा ने टिकट नहीं था, लेकिन वह आजाद चुनाव जीते. पहले ध्वाला ने कांग्रेस को समर्थन दिया और फिर सरकार बनी. दो मार्च 1998 को वीरभद्र ने सीएम पद की शपथ ली. इस बीच रमेश धवाला ने कांग्रेस से समर्थन वापस ले लिया. वीरभद्र सिंह ने नाटकीय अंदाज में सदन में बहुमत साबित करने से पहले ही त्यागपत्र दे दिया था. फिर ध्वाला के पाला बदलने से भाजपा ने हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) के सहयोग से सरकार बनाई.

    तब मोदी थे हिमाचल प्रभारी
    22 मार्च 1998 को शिमला के पीटरहॉफ में तत्कालीन भाजपा प्रदेश प्रभारी नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भाजपा-हिविकां गठबंधन पर फैसला हुआ था. बाद में यह सरकार पांच साल तक चली थी.

    मौजूदा आईपीएच मंत्री तब भाजपा-हिविकां सरकार में मंत्री बने थे.
    मौजूदा आईपीएच मंत्री तब भाजपा-हिविकां सरकार में मंत्री बने थे.


    संविधान से बाहर जाकर बनाई थी सरकार- महेंद्र सिंह
    मौजूदा आईपीएच मंत्री महेंद सिंह (IPH Minister Mahender Singh Thakur) ने बताया कि वह तीसरी बार विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे. उन्होंने बताया कि वह हिविकां से चुनकर आए थे. महेंद्र सिंह ने कहा ककि कांग्रेस ने संविधान से बाहर जाकर सरकार बनाई थी, लेकिन बाद में वीरभद्र सिंह को इस्तीफा देना पड़ा था. 24 मार्च 1998 को फिर भाजपा ने हिविकां के साथ सरकार गठन किया था. महेंद्र सिंह भाजपा-हिविकां सरकार में ढाई साल के लिए लोक निर्माण मंत्री रहे थे.

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