देह के बंधन से मुक्ति की चाह कहीं देह के जाल में ही तो नहीं फंस गई ?

“द सेकेंड सेक्स” में सिमोन द बोवुआर ने एक औरत की कहानी लिखी है, जिसके पति ने शादी की पहली रात ही उससे कहा कि उसकी जांघें बदसूरत हैं, और फिर वो जिंदगी भर उसके सामने निर्वस्त्र होने में शर्मिंदा होती रही

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 26, 2019, 1:50 PM IST
देह के बंधन से मुक्ति की चाह कहीं देह के जाल में ही तो नहीं फंस गई ?
मार्सेला साबिया का सेल्‍फ पोर्ट्रेट
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 26, 2019, 1:50 PM IST
तीन साल पहले इंस्टाग्राम पर एक लड़की से मेरी जान-पहचान हुई- मार्सेला साबिया. ब्राजील की रहने वाली थी. जिस चीज ने उसकी ओर मेरा ध्यान खींचा, वो थे उसके रेखाचित्र और हर चित्र के साथ एक लंबी कहानी. कई बार उन चित्रों में वो खुद होती, अपनी ही कहानी सुनाती.

उसके हर चित्र में एक स्त्री थी. मोटी, बेडौल, बेढ़ब, विचित्र, बेआकार और कभी निराकार. उसकी देह पर हमेशा अजीब से निशान होते. कभी जलने के, कभी कटने के. कभी बच्चे के जन्म के लिए पेट पर लगे चीरे के. कभी दाग-धब्बे, काले खुरदुरे गड्ढे. बालों वाले हाथ-पैर और छातियां. हर चित्र में एक स्त्री थी और हर स्त्री निर्वस्त्र. लेकिन किसी देह को ऐसे नहीं रचा गया था, जैसा हम राजा रवि वर्मा के चि़त्रों में देखते हैं या पिकासो के या किसी भी पुरुष चित्रकार के. ज्यादा ज्ञान नहीं मुझे, लेकिन याद नहीं आता कि किस मर्द ने कभी दागों और जलने के निशानों वाली, चीरे हुए पेट और झूलते हुए स्तनों वाली बेढ़ब, बेआकार स्त्री का चित्र बनाया था, ऐसे कि वो अपनी ही देह के आकार सा जान पड़े. अपने आसपास की देखी-पहचानी स्त्रियों के आकार सा, अपनी मां, अपनी दादी, अपनी नानी की देह सा.

मार्सेला हर रोज ऐसे चित्र बना रही थी और हर चित्र के साथ एक कहानी सुना रही थी.

ये कहानी उन चित्रों से ज्यादा उस कहानी के बारे में है.

हर चित्र ये कहता था कि हर शरीर सुंदर है. हर दाग सुंदर है. देह पर पड़ा पीड़ा का हर निशान सुंदर है. सुंदर आकार की परिभाषा को तोड़ता, चुनौती देता हर नया आकार सुंदर है. लेकिन जाने क्या था उन शब्दों में कि अपनी देह को स्वीकारने और गर्व करने के संदेश से भरे वो शब्द किसी गहरी पीड़ा से निकले जान पड़ते थे. उसे हर रोज एक नया चित्र बनाकर खुद को और उन 38 हजार लोगों को याद दिलाना पड़ता था, जो मार्सेला को इंस्टाग्राम पर फॉलो कर रहे थे कि “इस शरीर पर शर्मिंदा मत होना, इस पर गर्व करना.”

मार्सेला साबिया की इंस्‍टाग्राम वॉल से
मार्सेला साबिया की इंस्‍टाग्राम वॉल से


वो कई बार अपनी बिलकुल निर्वस्त्र तस्वीर लगाती और कहती कि “वो अपनी देह में अवस्थित इस जीवन पर कितना गर्व करती है.” लेकिन वो शब्द गर्व से ज्यादा किसी आंतरिक बेचैनी को बयां कर रहे थे. उसके शब्द बहुत उदास थे. उसकी आंखें अकेली और देह चोट खाई हुई.
वो जितनी बार ये बात कह रही थी, जाहिर था, किसी और से नहीं, खुद से ही कह रही थी. वो रोज एक नया चित्र बनाती और रोज खुद को याद दिलाती. ये क्रम अब तक जारी है.

रूपी कौर अपनी कविताओं के साथ जितनी बार एक स्त्री देह का आकार रचती है, वो देह भी हर बार चोट खाई होती है. कविता देह की सुंदरता की दुनिया की दी परिभाषा से मुक्त होना चाहती है, लेकिन जाकर हर बार उसी खाई में गिरती है. देह से मुक्त होने की कोशिश में भी देह ही जीवन का केंद्र हो गई है.

एक और लड़की है अनंदिता, प्लस साइज मॉडल. इंस्टाग्राम पर रोज अपनी तस्वीर लगाती है, बॉडी पॉजिटिविटी के मैसेज के साथ. एक बार मुझे दिए एक इंटरव्यू में उसने कहा था, “हमारे बंगाली में एक कहावत है, जिसके भीतर अंधेरा है, वही तो जगत का उजाला है.” यानी जिसने दुख पाया, उसी ने सुख को देखने की नजर.

मार्सेला साबिया की इंस्‍टाग्राम वॉल से
मार्सेला साबिया की इंस्‍टाग्राम वॉल से


कई बार बिकनी और खूबसूरत सिल्क लांजरी में उसकी तस्वीरें होती हैं. बॉडी शेप के सिखाए गए नियमों  को तोड़ती हुई, अपने नए नियम गढ़ती हुई. वो बताना चाहती है कि दुनिया को बेआकार सा लगता मेरा फैला हुआ आकार भी आकर्षक हो सकता है, सेक्सी और सेंसुअस. लेकिन उसकी गौरव कथा में भी भीतर कहीं गहरी व्यथा है. होना तो मैं भी नहीं चाहती थी ऐसा, लेकिन अब जब ऐसी ही हूं तो इसे दर्प से स्वीकार करना चाहती हूं. खुद को और दुनिया को रोज एक नई तस्वीर के साथ याद दिलाना, मर्दवाद को चिढ़ाना कि देखो, “मैं तुम्हारे पैमानों पर फिट नहीं, लेकिन फिर भी मैं सुंदर हूं.”

मार्सेला से लेकर अनंदिता तक हर वो लड़की, जो अपना काउंटर नरेटिव रच रही है, मुझे अच्छी लगती है. जिसकी त्वचा का रंग काला है, जिसकी देह फैली हुई है, जिसके शरीर पर जलने के निशान हैं, जिसके मुंह पर चेचक के दाग हैं, आंखों के नीचे काली झाईं, जिसकी जांघें मोटी हैं और छातियां छोटी, लटकी, बेआकार. हर वो लड़की, जिसे आसपास की दुनिया रोज याद दिलाती है कि वो सुंदरता के पैमानों पर फिट नहीं, कि वो प्यार किए जाने के लायक नहीं, कि वो शादी के लायक नहीं, कि वो दुनिया में इज्जत से सिर उठाकर जीने के लायक नही. वो सबको अपने दाग दिखाकर कह रही है, “ये मैं हूं और मैं जैसी भी हूं, सुंदर हूं.”

लेकिन इस पूरे नरेटिव में एक पेंच और है.

जब हम किसी भी नियम को तोड़ने और अपने नए नियम रचने की शुरुआत करते हैं तो काउंटर नरेटिव ऐसे ही बनता है, रिएक्शन से. जब बोलने की मनाही हो तो बोलने का पहला मौका मिलते ही हम बहुत सारा बोल लेना चाहते हैं. हम बेलगाम बोलते हैं, कई बार बिना सोचे, बिना विचारे भी. यही तार्किक भी है. लेकिन सवाल ये है कि जब हम बहुत सारा बोल चुके होते हैं, अपना दिल खोल चुके होते हैं, जब सब भड़ास निकल चुकी, उसके बाद क्या. बदलाव की सतत प्रक्रिया में नरेटिव भी तो बदलने चाहिए, लेकिन क्या वो बदल रहा है या किसी एक बिंदु पर ठहर गया है टेप और लगातार एक ही राग लूप में बजे जा रहा है.

रूपी कौर की इंस्‍टाग्राम वॉल से
रूपी कौर की इंस्‍टाग्राम वॉल से


जिस सिमाज, जिस संस्कृति ने देह को ही स्त्री जीवन के केंद्र में रखा. उसकी सारी कहानी सुख, दुख, इज्जत, संस्कार, सम्मान, वैभव, सब देह से शुरू और देह पर खत्म. उसका जीवन मूल्य यही, उसके जीवन का सरमाया यही. जो था, बस शरीर था. सुंदर हुई तो सुंदर वर पाएगी. गोरी हुई तो प्यार की जाएगी. सब इज्जत देह में होगी, जिसे बचाएगी, सजाएगी. इज्जत भी देह होगी और बेइज्जत भी देह. सुख भी सारी देह और दुख भी सारी देह.

सामंतवाद से लेकर पूंजीवाद तक, आर्थिक व्यवस्था कोई रही हो, स्त्री को देह के केंद्र में रखने वाली ये मर्दवादी व्यवस्था हमेशा चाक-चौबंद रही. उस बाजार में भी, जिसके बारे में कहते हैं कि लड़कियां अपनी मर्जी से कपड़े उतार रही हैं और कह रही हैं, “माय बॉडी माय चॉइस”, जो आजादी के इस नरेटिव का, हमारे समय का सबसे बड़ा झूठ है. चॉइस आजाद व्यक्ति की होती है, उसकी नहीं, जिसे बाजार में काम चाहिए और काम देने वाला आदमी है. आदमी ही तय कर रहा है काम के नियम और काम की शर्तें और आदमी को ही चाहिए कि किंगफिशर के कैलेंडर के लिए सिर्फ ब्रा और चड्ढी पहनेंगी औरतें. उन्होंने चुना नहीं था ये पहनना. बाजार ने कोई और चॉइस दी ही नहीं थी उन्हें.

मार्सेला साबिया की इंस्‍टाग्राम वॉल से
मार्सेला साबिया की इंस्‍टाग्राम वॉल से


तो सच का एक पहलू तो ये है कि देह से मुक्ति के इस काउंटर नरेटिव के केंद्र में भी देह ही है. शरीर के बंधन से मुक्ति की राह भी शरीर के जाल में फंस गई है. अपनी पीड़ा को कह चुकने के बाद हम उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं. इसलिए हम रोज एक ही बात कह रहे हैं, रोज खुद को याद दिला रहे हैं कि “यू आर ब्यूटीफुल.”

“द सेकेंड सेक्स” में सिमोन द बोवुआर ने एक औरत की कहानी लिखी है, जिसके पति ने शादी की पहली रात ही उससे कहा कि उसकी जांघें बदसूरत हैं, और फिर वो जिंदगी भर उसके सामने निर्वस्त्र होने में शर्मिंदा होती रही. ये डेढ़ सौ साल पहले के फ्रांस की किसी स्त्री की कहानी थी, जिसे अपना जीवन इसलिए निरर्थक लगा क्योंकि उसकी देह को एक मर्द का अप्रूवल नहीं मिला.

डेढ़ सौ बाद आज के फ्रांस में अगर वैसी ही कोई औरत है तो वो क्या कर रही है? मोटी जांघों वाली कोई औरत, जिसे उस पुरुष ने बदसूरत कहा है, जिसकी छांह में वो प्रेम की उम्मीद में गई थी.

क्या वो बॉडी पॉजिटिविटी के काउंटर नरेटिव में अपनी पीड़ा छिपा रही है या वो सचमुच उस डेढ़ सौ साल पुराने नरेटिव से मुक्त हो गई है.

सवाल जटिल है, उत्तर भी आसान नहीं होगा.

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